विनय और वात्सल्य के पद
पंक्ति 1: अब कैं राखि लेहु भगवान। शब्दार्थ– अब कैं – इस बार राखि लेहु – रक्षा कीजिए व्याख्या: सूरदास जी ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे भगवान, इस बार आप मेरी रक्षा कर लीजिए। पंक्ति 2: हौं …



पंक्ति 1: अब कैं राखि लेहु भगवान।
शब्दार्थ–
अब कैं – इस बार
राखि लेहु – रक्षा कीजिए
व्याख्या: सूरदास जी ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे भगवान, इस बार आप मेरी रक्षा कर लीजिए।
पंक्ति 2: हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान।
शब्दार्थ–
हौं – मैं
द्रुम-डरिया – पेड़ की डाली
पारधि – शिकारी
व्याख्या: मैं एक अनाथ पक्षी के समान संसार रूपी पेड़ की डाली पर बैठा हूँ और माया रूपी शिकारी मुझ पर अपना बाण साधे हुए है।
पंक्ति 3: ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान।
शब्दार्थ–
भाज्यौ – भागना
ढुक्यौ – मँडरा रहा है
सचान – बाज पक्षी
व्याख्या: उस शिकारी के डर से मैं उड़कर भागना चाहता हूँ, लेकिन मेरे ऊपर अहंकार रूपी बाज पक्षी मँडरा रहा है जो मुझे खा जाना चाहता है।
पंक्ति 4: दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह, कौन उबारै प्रान।
शब्दार्थ–
दुहूँ भाँति – दोनों तरफ से
उबारै – बचाए
व्याख्या: इस प्रकार मेरे लिए दोनों तरफ से प्राणों का संकट आ गया है, अब मेरी जान कौन बचा सकता है।
पंक्ति 5: सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान।
शब्दार्थ–
सुमिरत ही – याद करते ही
अहि – साँप
डस्यौ – डस लिया
संधान – बाण का निशाना
व्याख्या: भगवान का स्मरण करते ही ज्ञान रूपी साँप ने उस माया रूपी शिकारी को डस लिया, जिससे उसके हाथ से बाण का निशाना छूट गया।
पंक्ति 6: सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय-जय कृपानिधान।।1।।
शब्दार्थ–
सर – बाण
कृपानिधान – कृपा के सागर अर्थात ईश्वर
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि शिकारी के हाथ से छूटा हुआ वह बाण सीधे उस बाज पक्षी को जा लगा। इस प्रकार दोनों संकट टल गए, ऐसे कृपा के सागर भगवान की जय हो।
पंक्ति 7: मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै।।
शब्दार्थ–
अनत – अन्यत्र या कहीं और
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि मेरा मन भगवान श्री कृष्ण को छोड़कर कहीं और सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
पंक्ति 8: जैसैं उड़ि जहाज कौ पच्छी, फिरि जहाज पर आवै।
शब्दार्थ–
पच्छी – पक्षी
व्याख्या: जिस प्रकार समुद्र में चलते हुए जहाज से उड़ने वाला पक्षी चारों ओर भटककर वापस उसी जहाज पर आ जाता है, वैसे ही मेरा मन भी लौटकर कृष्ण के पास ही आता है।
पंक्ति 9: कमल-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौं ध्यावै।
शब्दार्थ–
कमल-नैन – कमल के समान नेत्रों वाले कृष्ण
महातम – महिमा
ध्यावै – ध्यान करे
व्याख्या: कमल के समान नेत्रों वाले श्री कृष्ण की महान महिमा को छोड़कर मेरा मन किसी अन्य देवता का ध्यान कैसे कर सकता है।
पंक्ति 10: परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै।
शब्दार्थ–
परम गंग – पवित्र गंगा नदी
दुरमति – मूर्ख
कूप – कुआँ
व्याख्या: वह इंसान अत्यंत मूर्ख है जो अपनी प्यास बुझाने के लिए पवित्र गंगा नदी को छोड़कर कुआँ खुदवाता है।
पंक्ति 11: जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै।
शब्दार्थ–
मधुकर – भँवरा
अंबुज-रस – कमल का रस
करील-फल – एक कड़वा फल
व्याख्या: जिस भँवरे ने कमल के मीठे रस को चख लिया हो, उसे करील का कड़वा फल कभी अच्छा नहीं लग सकता।
पंक्ति 12: सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै।।2।।
शब्दार्थ–
कामधेनु – सभी इच्छाएं पूरी करने वाली गाय
तजि – छोड़कर
छेरी – बकरी
दुहावै – दुहे
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण जैसी कामधेनु गाय को छोड़कर भला कौन बकरी का दूध दुहना चाहेगा।

वात्सल्य
पंक्ति 13: हरि जू की बाल-छबि कहौं बरनि।
शब्दार्थ–
हरि जू – श्री कृष्ण
बाल-छबि – बचपन की सुंदरता
बरनि – वर्णन करना
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि मैं श्री कृष्ण के बचपन की अत्यंत मनमोहक सुंदरता का वर्णन कर रहा हूँ।
पंक्ति 14: सकल सुख की सींव, कोटि-मनोज-सोभा-हरनि।
शब्दार्थ–
सकल – सम्पूर्ण
सींव – सीमा
कोटि-मनोज – करोड़ों कामदेव
हरनि – हरने वाली
व्याख्या: उनकी वह सुंदरता सभी सुखों की अंतिम सीमा है और करोड़ों कामदेवों की सुंदरता को भी फीका करने वाली है।
पंक्ति 15: भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि।
शब्दार्थ–
भुजंग – साँप
सरोज – कमल
बिधु – चंद्रमा
लरनि – लड़ाई
व्याख्या: उनकी भुजाओं ने साँपों को, नेत्रों ने कमल को और उनके सुंदर मुख ने चंद्रमा को भी सुंदरता की लड़ाई में जीत लिया है।
पंक्ति 16: रहे बिबरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि।
शब्दार्थ–
बिबरनि – बिलों में
सलिल – जल
दुरि – छिपकर
व्याख्या: कृष्ण से हारने के डर से साँप बिलों में, कमल जल में और चंद्रमा आकाश में जाकर छिप गए हैं।
पंक्ति 17: मंजु मेचक मृदुल तनु, अनुहरत भूषन भरनि।
शब्दार्थ–
मंजु – सुंदर
मेचक – साँवला
मृदुल – कोमल
अनुहरत – अनुकूल
व्याख्या: उनके सुंदर, साँवले और कोमल शरीर पर पहने हुए आभूषण बहुत ही प्यारे लग रहे हैं।
पंक्ति 18: मनहुँ सुभग सिंगार-सिसु-तरु, फर्यौ अदभुत फरनि।
शब्दार्थ–
मनहुँ – मानो
सुभग – सुंदर
सिसु-तरु – छोटा पेड़
फर्यौ – फला हो
व्याख्या: उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो श्रृंगार रस का कोई छोटा और सुंदर पेड़ अद्भुत फलों से लद गया हो।
पंक्ति 19: चलत पद-प्रतिबिम्ब मनि आँगन घुटुरुवनि करनि।
शब्दार्थ–
पद-प्रतिबिम्ब – पैरों की परछाईं
मनि आँगन – मणियों से जड़ा आँगन
व्याख्या: जब कृष्ण मणियों से जड़े हुए आँगन में घुटनों के बल चलते हैं, तो उनके पैरों की परछाईं बहुत सुंदर लगती है।
पंक्ति 20: जलज-संपुट-सुभग-छबि भरि लेति उर जनु धरनि।
शब्दार्थ–
जलज-संपुट – कमल का दोना
उर – हृदय
धरनि – धरती
व्याख्या: उस परछाईं को देखकर ऐसा लगता है मानो धरती उनके कमल रूपी चरणों की सुंदरता को कमल के दोने में भरकर अपने हृदय में रख रही हो।
पंक्ति 21: पुन्य फल अनुभवति सुतहिं बिलोकि कै नंद-घरनि।
शब्दार्थ–
पुन्य फल – पुण्यों का फल
सुतहिं – पुत्र को
नंद-घरनि – नंद बाबा की पत्नी (यशोदा)
व्याख्या: माता यशोदा अपने पुत्र कृष्ण की इस सुंदरता को देखकर अपने पूर्व जन्मों के पुण्यों का फल महसूस करती हैं।
पंक्ति 22: सूर प्रभु की उर बसी किलकनि ललित लरखनि।।3।।
शब्दार्थ–
उर बसी – हृदय में बस गई
किलकनि – किलकारी मारना
लरखनि – लड़खड़ाना
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि मेरे हृदय में भी प्रभु श्री कृष्ण की वह किलकारी मार कर हँसना और लड़खड़ा कर चलना बस गया है।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव:
रस: इन पदों में शांत रस (विनय) और वात्सल्य रस (बाल लीला) का अत्यंत सुंदर प्रयोग हुआ है।
छंद: पूरी कविता में ज्ञेय पद छंद का प्रयोग किया गया है।
अलंकार: अनुप्रास, रूपक, उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकारों का बहुत ही सहज और सुंदर प्रयोग हुआ है।
कविता का केंद्रीय संदेश:
सूरदास जी के इन पदों का मुख्य संदेश सगुण भक्ति और सच्चे प्रेम की महिमा को स्थापित करना है। विनय के पदों में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाया गया है, जबकि वात्सल्य में बाल कृष्ण की मनमोहक लीलाओं का सजीव चित्रण है।