विनय पत्रिका
प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित "विनय पत्रिका" से ली गई हैं। 'विनय पत्रिका' के इन पदों के माध्यम से तुलसीदास जी ने ई…


प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित "विनय पत्रिका" से ली गई हैं।
'विनय पत्रिका' के इन पदों के माध्यम से तुलसीदास जी ने ईश्वर के प्रति सच्चे और निस्वार्थ आत्मसमर्पण का महान संदेश दिया है। वे बताते हैं कि यह संसार और इसके सुख ओस की बूँदों, धुएँ और काँच की परछाईं की तरह बिल्कुल झूठे और विनाशकारी हैं। जब तक मनुष्य के अंदर से "मैं और मेरा" (अहंकार) खत्म नहीं होता, तब तक उसे सच्ची शांति नहीं मिल सकती। अंत में कवि यह संकल्प लेते हैं कि वे अपना बचा हुआ जीवन इंद्रियों के गुलाम बनकर बर्बाद नहीं करेंगे, बल्कि अपने मन रूपी भँवरे को हमेशा श्री राम के चरण-कमलों में ही लगा कर रखेंगे।

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो।
शब्दार्थ–
कबहुँक – कभी
हौं – मैं
यहि रहनि – इस तरह के जीवन या रहन-सहन में
रहौंगो – रहूँगा
व्याख्या: तुलसीदास जी भगवान श्री राम से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु, क्या कभी मेरे जीवन में ऐसा सौभाग्य आएगा कि मैं संतों के जैसी इस जीवन-शैली और रहन-सहन को अपना पाऊँगा।
श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा तें संत सुभाव गहौंगो।।
शब्दार्थ–
कृपालु – कृपा करने वाले
तें – से
संत सुभाव – संतों जैसा स्वभाव
गहौंगो – ग्रहण करूँगा या अपनाऊँगा
व्याख्या: क्या कभी मुझ पर कृपालु श्री रघुनाथ जी की ऐसी कृपा होगी कि मैं भी सच्चे संतों के जैसे पवित्र और शांत स्वभाव को अपना सकूँगा।
जथालाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो।।
शब्दार्थ–
जथालाभ – जो कुछ भी मिल जाए
काहू सों – किसी से भी
चहौंगो – चाहूँगा या माँगूंगा
व्याख्या: जो कुछ भी मुझे अपनी मेहनत या भगवान की इच्छा से मिल जाएगा, मैं हमेशा उसी में संतोष करूँगा और कभी भी किसी से कुछ और माँगने की इच्छा नहीं रखूँगा।
परहित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो।
शब्दार्थ–
परहित-निरत – दूसरों की भलाई में लगा हुआ
निरंतर – लगातार
मन क्रम बचन – मन, कर्म और वचन से
नेम – नियम
निबहौंगो – निभाऊँगा
व्याख्या: मैं हमेशा दूसरों की भलाई करने में लगा रहूँगा और अपने मन, कर्म तथा वचनों से कभी किसी का बुरा न करने के इस नियम को जीवन भर पूरी ईमानदारी से निभाऊँगा।
परुषबचन अतिदुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो।
शब्दार्थ–
परुषबचन – कठोर या कड़वे वचन
अतिदुसह – जो सहे न जा सकें
स्रवन – कानों से
तेहि पावक – उस आग में
दहौंगो – जलूँगा या क्रोधित होऊँगा
व्याख्या: यदि कोई मुझे ऐसे कड़वे और कठोर शब्द कहेगा जिन्हें सहना बहुत मुश्किल हो, तब भी मैं उन्हें अपने कानों से सुनकर क्रोध रूपी आग में नहीं जलूँगा, बल्कि शांत रहूँगा।
बिगत मान, सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो।।
शब्दार्थ–
बिगत मान – सम्मान की इच्छा से दूर
सम सीतल – समान रूप से शांत
पर-गुन – दूसरों के गुण
व्याख्या: मैं सम्मान और अपमान की भावना से ऊपर उठकर अपने मन को हमेशा एक समान और शांत रखूँगा। मैं केवल दूसरों के अच्छे गुणों की ही चर्चा करूँगा, कभी किसी के दोष या बुराइयाँ नहीं निकालूँगा।
परिहरि देहजनित चिंता, दुख सुख समबुद्धि सहौंगो।
शब्दार्थ–
परिहरि – छोड़कर
देहजनित – शरीर से जुड़ी
समबुद्धि – समान भाव से
सहौंगो – सहूँगा
व्याख्या: मैं शरीर से जुड़ी सभी मोह-माया और चिंताओं को छोड़ दूँगा। जीवन में आने वाले सुख और दुख, दोनों को मैं एक समान भाव से और बिना विचलित हुए सह लूँगा।
तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि भक्ति लहौंगो।।1।।
शब्दार्थ–
यहि पथ – इसी रास्ते पर
अबिचल – बिना डिगे या अटल
लहौंगो – प्राप्त करूँगा
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु श्री राम, क्या कभी ऐसा दिन आएगा जब मैं संतों के बताए गए इस रास्ते पर अटल होकर चलता रहूँगा और भगवान की सच्ची भक्ति को प्राप्त कर लूँगा।

ऐसी मूढ़ता या मन की।
शब्दार्थ–
मूढ़ता – मूर्खता या पागलपन
व्याख्या: तुलसीदास जी अपनी आत्मा को समझाते हुए कहते हैं कि मेरे इस मन की मूर्खता भी कितनी अजीब और बड़ी है।
परिहरि रामभगति-सुरसरिता आस करत ओसकन की।।
शब्दार्थ–
परिहरि – छोड़कर
सुरसरिता – देवताओं की नदी (गंगा)
आस करत – उम्मीद करता है
ओसकन – ओस की बूँदों से
व्याख्या: मेरा यह मूर्ख मन श्री राम की भक्ति रूपी पवित्र गंगा नदी को छोड़कर, अपनी प्यास बुझाने के लिए ओस की छोटी-छोटी बूँदों (सांसारिक सुखों) से उम्मीद लगाए बैठा है।
धूमसमूह निरखि चातक ज्यों तृषित जानि मति घन की।
शब्दार्थ–
धूमसमूह – धुएँ का बादल
निरखि – देखकर
चातक – पपीहा पक्षी
तृषित – प्यासा
मति – बुद्धि
घन की – बादल की
व्याख्या: यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई प्यासा चातक पक्षी आकाश में उड़ते हुए काले धुएँ को असली बादल समझ लेता है और पानी की उम्मीद में उसकी तरफ दौड़ पड़ता है।
नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की।।
शब्दार्थ–
बारि – पानी
पुनि – उल्टे
लोचन की – आँखों की
व्याख्या: लेकिन उस धुएँ के पास जाने पर उस पक्षी को न तो शीतलता मिलती है और न ही पीने के लिए पानी मिलता है। उल्टे, धुएँ के कारण उसकी आँखों को नुकसान ही पहुँचता है अर्थात वैसे ही संसार से केवल दुख मिलता है।
ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़ छाँह आपने तन की।
शब्दार्थ–
गच-काँच – काँच का फर्श
बिलोकि – देखकर
सेन – बाज पक्षी
जड़ – मूर्ख
व्याख्या: जिस प्रकार कोई मूर्ख बाज पक्षी काँच के साफ फर्श पर अपनी ही परछाईं को देखता है।
टुटत अति आतुर अहार बस छति बिसारि आनन की।।
शब्दार्थ–
टुटत – टूट पड़ता है
आतुर – बेचैन होकर
अहार बस – भोजन के लालच में
छति – नुकसान
बिसारि – भूलकर
आनन की – अपने मुँह का
व्याख्या: और उस परछाईं को दूसरा पक्षी (शिकार) समझकर भूख के मारे बेचैन होकर उस पर टूट पड़ता है। इस झपट्टे में वह अपने मुँह और चोंच को होने वाले भारी नुकसान को भी भूल जाता है।
कहँ लौं कहौं कुचाल कृपानिधि जानत हौ गति मन की।
शब्दार्थ–
कहँ लौं – कहाँ तक
कुचाल – बुरी आदतें
कृपानिधि – कृपा के भंडार (प्रभु)
हौ – हो
गति – दशा या हालत
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि हे कृपा के भंडार प्रभु श्री राम, मैं अपने इस मन की बुरी आदतों और मूर्खताओं के बारे में आपको कहाँ तक बताऊँ, आप तो स्वयं मेरे मन की सारी दशा पहले से ही जानते हैं।
तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।।2।।
शब्दार्थ–
हरहु – दूर कीजिए
दुसह – जो सहा न जाए
लाज – लाज या सम्मान
निज पन की – अपनी प्रतिज्ञा की (दीनबंधु होने की)
व्याख्या: हे प्रभु, अब आप ही मेरे इस न सहे जा सकने वाले भारी दुख और अज्ञान को दूर कीजिए और पतितों का उद्धार करने की अपनी प्रतिज्ञा की लाज रखिए।

हे हरि! कस न हरहु भ्रम भारी ?
शब्दार्थ–
हरि – भगवान
कस न – क्यों नहीं
हरहु – दूर करते हो
भ्रम भारी – बहुत बड़ा भ्रम या अज्ञान
व्याख्या: हे भगवान, आप मेरे मन में फैले हुए इस बहुत बड़े अज्ञान और भ्रम को दूर क्यों नहीं कर देते?
जद्यपि मृषा सत्य भासै जब लगि नहिं कृपा तुम्हारी।।
शब्दार्थ–
मृषा – झूठ या माया
भासै – दिखाई देता है
जब लगि – जब तक
अर्थ अबिद्यमान जानिय संसृति नहिं जाइ गोसाईं।
शब्दार्थ–
अबिद्यमान – जो मौजूद नहीं है (झूठा)
जानिय – जानने पर भी
संसृति – संसार का चक्कर या जन्म-मरण
नहिं जाइ – नहीं छूटता
गोसाईं – हे स्वामी
व्याख्या: हे स्वामी, यह संसार वास्तव में झूठा और नाशवान है, यह बात जानने और समझने के बाद भी इंसान इस संसार के मोह-माया के चक्कर से छूट नहीं पाता है।
बिनु बाँधे निज हठ सठ परबस पर्यो कीर की नाईं।।
शब्दार्थ–
बिनु बाँधे – बिना किसी के बाँधे
निज हठ – अपनी ही जिद्द से
सठ – मूर्ख
परबस – दूसरों के वश में या गुलाम
कीर – तोता
नाईं – तरह
व्याख्या: यह मूर्ख इंसान बिल्कुल उस तोते की तरह है, जिसे किसी ने बाँधा नहीं है, फिर भी वह अपने ही डर और हठ के कारण उस डंडे को कसकर पकड़े रहता है और खुद को गुलाम मान लेता है।
सपने ब्याधि बिबिध बाधा भइ, मृत्यु उपस्थित आई।
शब्दार्थ–
ब्याधि – बीमारी
बिबिध – अनेक प्रकार की
उपस्थित – सामने
व्याख्या: यह संसार का मोह ऐसा है जैसे कोई इंसान सपना देख रहा हो कि उसे अनेक भयानक बीमारियाँ और बाधाएँ आ घेरी हैं, और उसकी मृत्यु बिल्कुल सामने आ गई है।
बैद अनेक उपाय करहिं, जागे बिनु पीर न जाई।।
शब्दार्थ–
बैद – डॉक्टर या वैद्य
पीर – पीड़ा या दर्द
न जाई – दूर नहीं होता
व्याख्या: सपने में चाहे कितने भी वैद्य आकर उसका इलाज कर लें, लेकिन उसके उस सपने का दर्द तब तक दूर नहीं होगा, जब तक कि वह सचमुच में नींद से जाग न जाए (अर्थात ज्ञान प्राप्त न कर ले)।
श्रुति-गुरु-साधु-स्मृति-संमत यह दृश्य सदा दुखकारी।
शब्दार्थ–
श्रुति – वेद
संमत – माना हुआ
दृश्य – यह दिखाई देने वाला संसार
व्याख्या: वेद, गुरु, संत-महात्मा और स्मृतियाँ (धर्मग्रंथ), सभी ने एक स्वर में यही माना है कि यह दिखाई देने वाला सांसारिक मोह-माया हमेशा दुख देने वाला ही होता है।
तेहि बिन तजे, भजे बिन रघुपति बिपति सकै को टारी ?
शब्दार्थ–
तजे – छोड़े
भजे – भगवान का नाम जपे
बिपति – मुसीबत
व्याख्या: इस झूठे संसार का मोह छोड़े बिना, और प्रभु श्री राम की सच्ची भक्ति किए बिना, भला इंसान के जीवन की इस बड़ी मुसीबत को कौन दूर कर सकता है? कोई नहीं।
बहु उपाय संसार-तरन कहँ बिमल गिरा श्रुति गावै।
शब्दार्थ–
तरन कहँ – पार करने के लिए
बिमल गिरा – पवित्र वाणी
श्रुति गावै – वेद गाते हैं या बताते हैं
व्याख्या: इस भवसागर (संसार) को पार करने के लिए वेदों की पवित्र वाणियों में अनेक प्रकार के उपाय और रास्ते बताए गए हैं।
तुलसिदास 'मैं-मोर' गए बिनु जिय सुख कबहुँ न पावै।।3।।
शब्दार्थ–
मैं-मोर – मैं और मेरा (अहंकार)
जिय – यह जीव या आत्मा
व्याख्या: लेकिन तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक इंसान के मन से "मैं और मेरा" वाला यह झूठा घमंड पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, तब तक उसकी आत्मा को कभी भी सच्चा सुख और शांति नहीं मिल सकती।

अब लौं नसानी अब न नसैहौं।
शब्दार्थ–
अब लौं – अब तक
नसानी – नष्ट की या बर्बाद की
नसैहौं – बर्बाद करूँगा
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि मैंने अपनी अब तक की पूरी उम्र संसार के झूठे मोह-माया में फँसकर बर्बाद कर दी है, लेकिन अब मैं अपने बचे हुए जीवन को इस तरह बर्बाद नहीं होने दूँगा।
राम कृपा भवनिसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं।।
शब्दार्थ–
भवनिसा – संसार रूपी रात (अज्ञान)
सिरानी – बीत गई या खत्म हो गई
डसैहौं – बिछाऊँगा या सोऊँगा
व्याख्या: प्रभु श्री राम की महान कृपा से मेरे जीवन की अज्ञान रूपी वह अंधेरी रात अब बीत चुकी है। अब मुझे ज्ञान हो गया है (मैं जाग गया हूँ), इसलिए अब मैं वापस उस अज्ञान की नींद में अपना बिस्तर नहीं बिछाऊँगा।
पायो नाम चारु चिंतामनि, उर-कर ते न खसैहौं।
शब्दार्थ–
चारु – सुंदर
चिंतामनि – मनचाहा फल देने वाली मणि
उर-कर – हृदय रूपी हाथ
खसैहौं – खिसकने दूँगा या गिरने दूँगा
व्याख्या: मैंने प्रभु श्री राम के नाम रूपी अत्यंत सुंदर और सभी इच्छाएँ पूरी करने वाली चिंतामणि को प्राप्त कर लिया है। अब मैं इस अनमोल मणि को अपने हृदय रूपी हाथों से कभी नीचे नहीं गिरने दूँगा।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं।
शब्दार्थ–
सुचि – पवित्र
रुचिर – सुंदर
कसौटी – सोना परखने वाला पत्थर
चित कंचनहिं – मन रूपी सोने को
कसैहौं – परखूँगा
व्याख्या: मैं श्री राम के साँवले, पवित्र और सुंदर रूप को एक कसौटी (सोना परखने वाला पत्थर) बनाऊँगा, और उस पर अपने मन रूपी सोने को रगड़कर परखूँगा कि मेरा मन उनकी भक्ति में कितना सच्चा और खरा है।
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं।
शब्दार्थ–
परबस – दूसरों के वश में (इंद्रियों के गुलाम)
निज बस – अपने खुद के वश में
व्याख्या: जब तक मैं अपनी इंद्रियों (आँख, कान, जीभ आदि) का गुलाम था, तब तक इन इंद्रियों ने मुझे अपने इशारों पर नचाकर दुनिया के सामने मेरी बहुत हँसी उड़ाई। लेकिन अब मैं स्वयं का स्वामी बन गया हूँ, इसलिए अब मैं इन्हें खुद पर हँसने का कोई मौका नहीं दूँगा।
मन-मधुकर पन करि तुलसी रघुपति पद-कमल बसैहौं।।4।।
शब्दार्थ–
मन-मधुकर – मन रूपी भँवरा
पन करि – प्रतिज्ञा करके या कसम खाकर
पद-कमल – चरण रूपी कमल
बसैहौं – बसाऊँगा या लगाऊँगा
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि अब मैंने पक्की प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं अपने इस मन रूपी भँवरे को हमेशा के लिए प्रभु श्री राम के सुंदर चरण रूपी कमलों के प्रेम रस में ही बसा कर रखूँगा।
काव्य सौंदर्य और सारांश:
* रस: संपूर्ण पदों में शांत रस और भक्ति रस की सुंदर और गहरी प्रधानता है, जो ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाती है।
* छंद: यह संपूर्ण पाठ गेय पद छंद (गाने योग्य पदों) में रचा गया है, जो बहुत ही मधुर है।
* अलंकार: इसमें रूपक (रामकृपा भवनिसा, नाम चिंतामनि, मन-मधुकर, पद-कमल), अनुप्रास, और दृष्टांत (चातक, बाज और तोते का उदाहरण) अलंकारों का अत्यंत सटीक और स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
कविता का सारांश:
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित "विनय पत्रिका" के इन पदों में भक्त की ईश्वर के प्रति सच्ची पुकार और सांसारिक मोह-माया से मुक्ति की तड़प को दर्शाया गया है। पहले पद में तुलसीदास जी भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे भी संतों के समान ऐसा शांत और निर्मल स्वभाव प्राप्त करना चाहते हैं, जहाँ वे हर सुख-दुख में समान रहें, कभी किसी पर क्रोध न करें, और संतोषी जीवन जीते हुए हमेशा दूसरों की भलाई में लगे रहें। वे अपने मन की मूर्खता पर पछतावा करते हैं कि उनका मन गंगा के समान पवित्र राम-भक्ति को छोड़कर ओस की बूँदों जैसे छोटे सांसारिक सुखों के पीछे भाग रहा है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे प्यासा चातक पक्षी धुएँ को बादल समझ लेता है या मूर्ख बाज काँच में अपनी परछाईं देखकर खुद को ही घायल कर लेता है।
आगे कवि भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु, मेरे मन के इस भारी भ्रम और अज्ञान को दूर कर दीजिए। हालाँकि यह संसार झूठा है, लेकिन भगवान की कृपा के बिना यह बिल्कुल सच लगता है। इंसान अपनी ही जिद और मोह के कारण इस संसार में ऐसे फँसा है जैसे तोता बिना किसी के बाँधे ही डंडे को पकड़कर खुद को गुलाम मान लेता है। जैसे सपने में होने वाली भयानक बीमारी का दर्द जागने पर ही खत्म होता है, वैसे ही ज्ञान प्राप्त होने पर ही इस संसार का दुख दूर हो सकता है। जब तक इंसान के मन में "मैं और मेरा" का अहंकार रहता है, उसे कभी सुख नहीं मिलता।
अंतिम पद में तुलसीदास जी एक दृढ़ संकल्प लेते हुए कहते हैं कि मैंने अपनी अब तक की उम्र अज्ञान में बर्बाद कर दी है, लेकिन अब श्री राम की कृपा से मैं जाग गया हूँ और अब अपना जीवन व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। उन्होंने राम के नाम रूपी चिंतामणि को प्राप्त कर लिया है और अब वे इसे अपने हृदय से कभी अलग नहीं करेंगे। जब तक वे अपनी इंद्रियों के वश में थे, तब तक दुनिया ने उनकी हँसी उड़ाई, लेकिन अब वे स्वयं के स्वामी बन गए हैं। अंत में वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अपने मन रूपी भँवरे को हमेशा के लिए श्री राम के चरण कमलों के प्रेम में ही लगाए रखेंगे।