विसर्ग संधि
1. विसर्ग संधि का अर्थ: विसर्ग संधि का अर्थ है- विसर्ग ( ः ) में होने वाला परिवर्तन। संस्कृत या हिंदी व्याकरण में जब किसी शब्द के अंत में लगे विसर्ग का मेल किसी अन्य स्वर या व्यंजन से होता है, तो उस व…



1. विसर्ग संधि का अर्थ,परिभाषा और नियम:
1. विसर्ग संधि का अर्थ:
विसर्ग संधि का अर्थ है- विसर्ग ( ः ) में होने वाला परिवर्तन।
संस्कृत या हिंदी व्याकरण में जब किसी शब्द के अंत में लगे विसर्ग का मेल किसी अन्य स्वर या व्यंजन से होता है, तो उस विसर्ग के स्वरूप में जो बदलाव आता है, उसे विसर्ग संधि कहा जाता है।
विसर्ग संधि के मुख्य रूप से चार नियम होते हैं, जिन्हें पाणिनीय सूत्रों के माध्यम से नीचे सरल भाषा में समझाया गया है-
1. सत्व संधि:
2. रुत्व संधि:
3. उत्व संधि
4. विसर्ग लोप संधि
नियम 1: सत्व संधि:
सत्व का अर्थ है स् बन जाना। संस्कृत व्याकरण में जब विसर्ग के बाद कुछ विशेष कठोर व्यंजन आते हैं, तो विसर्ग बदलकर आधा स्, आधा श् या आधा ष् बन जाता है। विसर्ग के स्थान पर सकार (स्) होने की इसी प्रक्रिया को सत्व संधि कहते हैं। यह विसर्ग संधि का ही एक सबसे महत्वपूर्ण भेद है।
2. परिभाषा:
जब विसर्ग के बाद किसी भी वर्ग का पहला या दूसरा वर्ण (क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ) अथवा श, ष, स आए, तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है। आगे आने वाले वर्ण के उच्चारण स्थान के अनुसार यह स् कभी श् और कभी ष् में भी बदल जाता है।
मुख्य सूत्र- विसर्जनीयस्य सः
( विसर्ग का स्, श् या ष् में बदलना )
नियम का प्रयोग: इस सूत्र का अर्थ है कि यदि विसर्ग के बाद खर् प्रत्याहार (वर्ग के पहले, दूसरे वर्ण और श, ष, स) का कोई वर्ण हो, तो विसर्ग के स्थान पर स् हो जाता है।
3. परिवर्तन की सरल तालिका:
विसर्ग के बाद च या छ आए तो विसर्ग श् बन जाता है।
विसर्ग के बाद ट या ठ आए तो विसर्ग ष् बन जाता है।
विसर्ग के बाद त या थ आए तो विसर्ग स् बन जाता है।
क, ख, प, फ आने पर सामान्यतः विसर्ग में कोई बदलाव नहीं होता या वह जिह्वामूलीय/उपध्मानीय हो जाता है, जैसे प्रात: काल।
उदाहरण:
च या छ के साथ (श् में परिवर्तन):
नि: + चय = निश्चय
हरि: + चन्द्र = हरिश्चन्द्र
क: + चित् = कश्चित्
ट या ठ के साथ (ष् में परिवर्तन):
धनु: + टङ्कार = धनुष्टङ्कार
राम: + टीकते = रामष्टीकते
त या थ के साथ (स् में परिवर्तन):
नमः + ते = नमस्ते
रामः + च = रामश्च
निः + छल = निश्छल
धनुः + टङ्कार = धनुष्टङ्कार
ट्रिक:
विच्छेद करते समय यदि किसी शब्द के बीच में आधा स्, आधा श् या आधा ष् दिखाई दे और उसके तुरंत बाद कोई कठोर व्यंजन (च, छ, ट, ठ, त, थ) हो, तो उस आधे सकार को हटाकर सीधे विसर्ग लगा दें। यही सत्व संधि की सबसे आसान पहचान है।
विसर्ग के बाद क, ख या प, फ आने पर मुख्य रूप से तीन अलग-अलग नियम काम करते हैं। इन्हें सरल भाषा में नीचे समझाया गया है-
नियम 1: विसर्ग ज्यों का त्यों रहना (सामान्य नियम):
यदि विसर्ग से पहले अ या आ स्वर हो और उसके बाद क, ख, प या फ आए, तो विसर्ग में कोई बदलाव नहीं होता है। वह अपने मूल रूप में ही रहता है।
क और ख के उदाहरण:
प्रात: + काल = प्रात:काल
अन्त: + करण = अन्त:करण
रज: + कण = रज:कण
अध: + पतन = अध:पतन (यहाँ प है, लेकिन नियम समान है)
प और फ के उदाहरण:
पय: + पान = पय:पान
अन्त: + पुर = अन्त:पुर
तप: + पूत = तप:पूत
नियम 2: विसर्ग का आधा ष (ष्) बन जाना
यदि विसर्ग से पहले इ या उ स्वर हो (जैसे नि: या दु:) और उसके बाद क, ख, प या फ आए, तो विसर्ग बदलकर आधा ष (ष्) हो जाता है।
क और ख के उदाहरण:
नि: + काम = निष्काम
नि: + कपट = निष्कपट
दु: + कर्म = दुष्कर्म
दु: + कर = दुष्कर
प और फ के उदाहरण:
नि: + पाप = निष्पाप
नि: + पक्ष = निष्पक्ष
दु: + परिणाम = दुष्परिणाम
नि: + फल = निष्फल
नियम 3: विसर्ग का आधा स (स्) बन जाना (विशेष अपवाद)
नम: और पुर: जैसे कुछ विशेष शब्दों के बाद यदि क वर्ग (विशेषकर कार या कर शब्द) आए, तो विसर्ग आधे स (स्) में बदल जाता है।
विशेष उदाहरण:
नम: + कार = नमस्कार
पुर: + कार = पुरस्कार
तिर: + कार = तिरस्कार
भा: + कर = भास्कर
वाच: + पति = वाचस्पति (प आने पर भी स होता है)
ट्रिक:
क, ख, प या फ को देखकर अगर पहले वाले शब्द में नि: या दु: लगा हो, तो विसर्ग की जगह आधा ष लगा दें। अगर नम: या पुर: हो, तो आधा स लगा दें। और अगर अ की मात्रा वाले शब्द (जैसे प्रात:, पय:, अन्त:) हों, तो विसर्ग को बिल्कुल न छेड़ें, उसे वैसा ही रहने दें।
2. रुत्व संधि:
रुत्व संधि विसर्ग संधि का ही एक महत्वपूर्ण प्रकार है। रुत्व का सीधा और सरल अर्थ है, विसर्ग का र् (आधा र) में परिवर्तित हो जाना। जब व्याकरण के विशेष नियमों के कारण विसर्ग अपना रूप बदलकर र् बन जाता है, तो उस परिवर्तन को रुत्व संधि कहा जाता है।
2. परिभाषा:
यदि विसर्ग से पहले अ और आ स्वर को छोड़कर कोई अन्य स्वर (जैसे इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) हो, और विसर्ग के ठीक बाद कोई भी स्वर आए या किसी भी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ व्यंजन (ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म) आए अथवा य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण आए, तो विसर्ग के स्थान पर र् आदेश हो जाता है।
3. सूत्र और उसका प्रयोग:
पाणिनीय सूत्र- ससजुषो रुः
इस सूत्र का अर्थ है कि पद के अंत में आने वाले सकार (स्) और सजुष् शब्द के षकार (ष्) के स्थान पर रु (जिसका र् शेष बचता है) आदेश हो जाता है। व्याकरणिक प्रक्रिया में विसर्ग वास्तव में इसी स् या र् का ही एक रूप होता है। अतः जब अ या आ के अतिरिक्त अन्य स्वरों के बाद विसर्ग आता है और उसके सामने कोई घोष वर्ण (स्वर या मृदु व्यंजन) होता है, तो वह विसर्ग पुनः अपने मूल रूप र् में परिवर्तित हो जाता है।
4. नियम और परिवर्तन तालिका:
इस संधि का नियम बहुत ही स्पष्ट है, जिसे इस तालिका से सरलता से समझा जा सकता है।
विसर्ग से पहले का स्वर | विसर्ग के बाद आने वाला वर्ण | विसर्ग का परिवर्तन
> अ और आ को छोड़कर कोई भी स्वर (इ, उ आदि) |
> कोई भी स्वर, वर्ग का 3, 4, 5 वर्ण या य, र, ल, व, ह |
> विसर्ग बदलकर र् (आधा र) हो जाएगा |
5. उदाहरण:
क. विसर्ग के बाद स्वर आने पर (यहाँ आधा र् आगे वाले स्वर से मिलकर पूरा अक्षर बन जाता है):
मुनि: + अयम् = मुनिरयम् (विसर्ग र् बना और अ से मिलकर पूरा र हो गया)
हरि: + आगच्छति = हरिरागच्छति (विसर्ग र् बना और आ से मिलकर रा हो गया)
भानु: + उदेति = भानुरुदेति (विसर्ग र् बना और उ से मिलकर रु हो गया)
पितु: + इच्छा = पितुरिच्छा (विसर्ग र् बना और इ से मिलकर रि हो गया)
ख. विसर्ग के बाद व्यंजन आने पर (यहाँ आधा र् अगले अक्षर के ऊपर रेफ के रूप में लग जाता है):
गुरु: + जयति = गुरुर्जयति
कवि: + गच्छति = कविर्गच्छति
आशी: + वाद = आशीर्वाद
नि: + धन = निर्धन
दु: + जन = दुर्जन
3. उत्व संधि:
उत्व संधि विसर्ग संधि का ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। उत्व का सीधा सा अर्थ है- उ हो जाना। जब संस्कृत व्याकरण में विसर्ग कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण उ वर्ण में बदल जाता है और फिर अपने से ठीक पहले वाले अ के साथ मिलकर ओ बन जाता है, तो इस पूरी प्रक्रिया को उत्व संधि कहते हैं।
2. परिभाषा:
जब विसर्ग से पहले हृस्व अ हो और विसर्ग के बाद भी हृस्व अ हो, या किसी भी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर अथवा य, र, ल, व, ह में से कोई अक्षर हो, तो विसर्ग के स्थान पर उ आदेश हो जाता है। यह उ अपने से पहले वाले अ के साथ संधि करके ओ बन जाता है।
इस संधि को समझने के लिए महर्षि पाणिनि के दो मुख्य सूत्र हैं-
पहला सूत्र: अतो रोरप्लुतादप्लुते
सूत्र का प्रयोग: यदि विसर्ग के ठीक पहले अ हो और विसर्ग के ठीक बाद भी अ हो, तो विसर्ग का उ हो जाता है। पहले वाला अ और यह उ मिलकर ओ बन जाते हैं। बाद वाले अ के स्थान पर अवग्रह (ऽ) चिह्न लग जाता है।
दूसरा सूत्र: हशि च
सूत्र का प्रयोग: यदि विसर्ग के ठीक पहले अ हो और विसर्ग के बाद कोई हश् वर्ण (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ अक्षर या य, र, ल, व, ह) आए, तो विसर्ग का उ हो जाता है और वह पहले वाले अ के साथ मिलकर ओ बन जाता है। इस स्थिति में बाद में स्वर न होने के कारण अवग्रह (ऽ) चिह्न नहीं लगता है।
4. नियम और परिवर्तन तालिका:
यदि विसर्ग से ठीक पहले अ स्वर हो और विसर्ग के ठीक बाद भी अ स्वर आए, तो विसर्ग ओ की मात्रा में बदल जाता है। पीछे आने वाला अ लुप्त होकर अवग्रह चिह्न ( ऽ ) बन जाता है।
इस संधि के दोनों नियमों को नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझा जा सकता है-
नियम 1: (अ के बाद अ आने पर)
पहले पद का अंत: अ + विसर्ग
दूसरे पद की शुरुआत: अ
परिवर्तन: विसर्ग और पहला अ मिलकर ओ बनेंगे, और दूसरे अ का अवग्रह (ऽ) बन जाएगा।
नियम 2: (अ के बाद हश् वर्ण आने पर)
पहले पद का अंत: अ + विसर्ग
दूसरे पद की शुरुआत: वर्ग का 3, 4, 5 अक्षर या य, र, ल, व, ह
परिवर्तन: विसर्ग और पहला अ मिलकर केवल ओ बनेंगे, अवग्रह नहीं लगेगा।
5. उदाहरण:
नियम 1 के उदाहरण (अतो रोरप्लुतादप्लुते):
प्रथमः + अध्यायः = प्रथमोऽध्यायः (यहाँ विसर्ग का ओ हुआ और अ का ऽ हो गया)
कः + अपि = कोऽपि
रामः + अत्र = रामोऽत्र
सः + अवदत् = सोऽवदत्
नियम 2 के उदाहरण (हशि च):
मनः + रथः = मनोरथः (यहाँ विसर्ग का ओ हुआ, अवग्रह नहीं लगेगा क्योंकि र आया है)
सरः + जम् = सरोजम्
यशः + दा = यशोदा
तपः + वनम् = तपोवनम्
नमः + नमः = नमो नमः
याद रखने की ट्रिक:
पहचान: यदि किसी संस्कृत शब्द के बीच में ओ की मात्रा के ठीक बाद अवग्रह (ऽ) चिह्न दिखे, तो वहाँ पहला नियम लगा है। यदि ओ की मात्रा के बाद कोई ऐसा व्यंजन हो जो वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवा हो या य, र, ल, व, ह में से हो, तो वहाँ दूसरा नियम लगा है।
मूलमंत्र: विसर्ग के दोनों तरफ अ हो, तो ओऽ बनेगा। विसर्ग के पहले अ और बाद में गूँज वाले व्यंजन (हश्) हों, तो सिर्फ ओ बनेगा।
4. विसर्ग लोप संधि:
विसर्ग लोप का सीधा अर्थ है विसर्ग का गायब हो जाना या हट जाना। संस्कृत व्याकरण में संधि करते समय जब पहले पद के अंत में लगा विसर्ग पूरी तरह से लुप्त हो जाता है, तो इस प्रक्रिया को विसर्ग लोप संधि कहा जाता है।
1. परिभाषा:
जब किन्हीं विशेष व्याकरणिक परिस्थितियों में विसर्ग के बाद कोई स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग बिना कोई नया रूप लिए सीधा हट जाता है, तो उसे विसर्ग का लोप होना कहते हैं। विसर्ग हटने के बाद प्राय: दोनों पदों को मिलाकर नहीं लिखा जाता, बल्कि वे अलग-अलग ही लिखे जाते हैं।
2. सूत्र और उसका प्रयोग:
विसर्ग लोप के लिए पाणिनीय अष्टाध्यायी में अलग-अलग परिस्थितियों के लिए कई सूत्र दिए गए हैं। इनमें मुख्य सूत्र निम्नलिखित हैं-
भोभगोअघोअपूर्वस्य यो अशि (इसके साथ लोप: शाकल्यस्य और हलि सर्वेषाम् का प्रभाव)
एतत्तदो: सुलोपो अकोरनञ्समासे हलि
रो रि और ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घो अण:
इन सूत्रों का प्रयोग यह तय करता है कि विसर्ग से पहले कौन सा स्वर है और विसर्ग के बाद कौन सा वर्ण आ रहा है, जिसके प्रभाव से विसर्ग हट जाएगा।
3. नियम और परिवर्तन:
विसर्ग लोप को मुख्य रूप से चार सरल नियमों में समझा जा सकता है-
1. नियम: स: और एष: का नियम:
यदि स: और एष: शब्दों के बाद अ स्वर को छोड़कर कोई भी व्यंजन आ जाए, तो स: और एष: के विसर्ग का लोप हो जाता है।
2. नियम: अ स्वर का नियम:
यदि विसर्ग से ठीक पहले अ स्वर हो और विसर्ग के तुरंत बाद अ को छोड़कर कोई दूसरा स्वर (जैसे आ, इ, ई, उ, ए आदि) आ जाए, तो विसर्ग का लोप हो जाता है।
3. नियम: आ स्वर का नियम:
यदि विसर्ग से ठीक पहले आ स्वर हो और विसर्ग के बाद कोई भी स्वर आए या किसी भी वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण (ग, घ, ङ, ज आदि) आए अथवा य, र, ल, व, ह में से कोई वर्ण आए, तो विसर्ग का लोप हो जाता है।
4. नियम: र के बाद र आने का नियम:
यदि विसर्ग के स्थान पर र आ रहा हो और उसके ठीक बाद भी र आ जाए, तो पहले वाले र अर्थात विसर्ग का लोप हो जाता है। इसके साथ ही, विसर्ग से पहले वाला छोटा स्वर (ह्रस्व स्वर जैसे अ, इ, उ) बड़ा स्वर (दीर्घ स्वर जैसे आ, ई, ऊ) बन जाता है।
4. उदाहरण:
स: और एष: के विसर्ग लोप के उदाहरण:
स: + गच्छति = स गच्छति
एष: + बाल: = एष बाल:
स: + पठति = स पठति
अ के बाद अन्य स्वर आने पर विसर्ग लोप के उदाहरण:
अत: + एव = अत एव
कुत: + आगत: = कुत आगत:
आ के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग लोप के उदाहरण:
बाला: + अत्र = बाला अत्र
नरा: + गच्छन्ति = नरा गच्छन्ति
छात्रा: + लिखन्ति = छात्रा लिखन्ति
र के बाद र आने (तथा स्वर बड़ा होने) के उदाहरण:
नि: + रोग: = नीरोग:
नि: + रस: = नीरस:
हरि: + राजते = हरी राजते
याद रखने की ट्रिक:
अगर संधि किए हुए वाक्य में स या एष बिना विसर्ग के लिखे हों और उनके आगे कोई व्यंजन हो, या फिर नीरोग और नीरस जैसे शब्द दिखें जहाँ विसर्ग हटाकर पहली मात्रा बड़ी कर दी गई हो, तो वहाँ तुरंत विसर्ग लोप संधि पहचान लेनी चाहिए। विसर्ग हटने के बाद शब्दों को सटाकर नहीं लिखा जाता, यह इसकी सबसे बड़ी पहचान है।