पाठ - 1 वीणावादिनि वर दे
प्रिय विद्यार्थियों, हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में आपका स्वागत है। आज हम जिस कविता को पढ़ने जा रहे हैं, वह बहुत ही प्रेरणादायक है। एक शिक्षक के रूप में मेरा यह प्रयास रहेगा कि आ…


प्रिय विद्यार्थियों,
हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में आपका स्वागत है। आज हम जिस कविता को पढ़ने जा रहे हैं, वह बहुत ही प्रेरणादायक है। एक शिक्षक के रूप में मेरा यह प्रयास रहेगा कि आप इसके एक-एक शब्द और भाव को अपने हृदय से महसूस कर सकें।
संदर्भ और प्रसंग :
वीणावादिनि वर दे कविता महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित है। इस कविता में कवि ने विद्या और ज्ञान की देवी मां सरस्वती से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे भारतवासियों के मन से अज्ञान के अंधकार को दूर करें और उन्हें स्वतंत्रता तथा नए ज्ञान के प्रकाश से भर दें।

स्वतंत्रता और नवजागरण की प्रार्थना :
वर दे, वीणावादिनि वर दे !
शब्दार्थ
वर ~ वरदान
वीणावादिनि ~ वीणा बजाने वाली माता सरस्वती
व्याख्या
हे वीणा बजाने वाली माँ सरस्वती आप हम सभी को अपना आशीर्वाद और वरदान दीजिए।
प्रिय स्वतन्त्र-रव अमृत-मन्त्र नव
शब्दार्थ
प्रिय ~ प्यारा
स्वतन्त्र-रव ~ आजादी की मधुर ध्वनि
अमृत-मन्त्र ~ अमरता की ओर ले जाने वाला कल्याणकारी विचार
नव ~ नया
व्याख्या
हे माँ आप भारत के लोगों के मन में आजादी की वह प्यारी आवाज और अमरता का नया कल्याणकारी विचार भर दीजिए।
भारत में भर दे !
शब्दार्थ
भारत ~ हमारा देश भारतवर्ष
भर दे ~ पूरी तरह से डाल दे
व्याख्या
आप हमारे पूरे भारत देश में यह नई आजादी और अमरता का नया भाव पूरी तरह से प्रवाहित कर दीजिए।

अज्ञान का नाश और ज्ञान के प्रकाश की याचना :
काट अन्ध-उर के बन्धन-स्तर
शब्दार्थ
अन्ध-उर ~ अज्ञान से भरा हुआ हृदय
बन्धन-स्तर ~ गुलामी और बुराइयों की बेड़ियां
व्याख्या
हे माँ अज्ञान से भरे हुए हमारे हृदय में जो भी गुलामी और बुराइयों की बेड़ियां बंधी हैं उन्हें आप पूरी तरह से काट दीजिए।
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर,
शब्दार्थ
जननि ~ जन्म देने वाली माता
ज्योतिर्मय ~ प्रकाश से भरा हुआ
निर्झर ~ झरना
व्याख्या
हे माता आप हमारे हृदयों में ज्ञान का ऐसा प्रकाश से भरा हुआ झरना बहा दीजिए जिससे हमारा मन एकदम पवित्र हो जाए।
कलुष-भेद तम हर, प्रकाश भर
शब्दार्थ
कलुष-भेद ~ मन का मैल और भेदभाव
तम ~ अंधकार
हर ~ दूर करना
प्रकाश ~ रोशनी
व्याख्या
हमारे मन में जो भी मैल भेदभाव और अज्ञान का अंधकार है उसे आप हमेशा के लिए दूर कर दीजिए और वहां ज्ञान की रोशनी भर दीजिए।
जगमग जग कर दे !
शब्दार्थ
जगमग ~ पूरी तरह रोशन
जग ~ संसार
व्याख्या
हे माँ आप अपने ज्ञान के दिव्य प्रकाश से इस पूरे संसार को रोशन और चमकदार बना दीजिए।

नवसृजन और नई चेतना का वरदान :
नव गति, नव लय, ताल-छन्द नव,
शब्दार्थ
नव ~ नया
गति ~ चाल
लय ~ सुर और संगीत का प्रवाह
छन्द ~ कविता की रचना का नियम
व्याख्या
हे माँ आप हम सभी भारतवासियों को जीवन की नई चाल नया सुर और नई ताल वाली कविता का वरदान दीजिए।
नवल कंठ, नव जलद - मन्द्ररव,
शब्दार्थ
नवल ~ नया
कंठ ~ गला या आवाज
जलद ~ बादल
मन्द्ररव ~ गहरी और गंभीर आवाज
व्याख्या
आप हमें नई स्पष्ट आवाज दीजिए और बादलों की तरह गहरी तथा गंभीर गर्जना करने की असीम शक्ति प्रदान कीजिए।
नव नभ के नव विहग-वृन्द को
शब्दार्थ
नव नभ ~ नया आकाश
विहग-वृन्द ~ पक्षियों का समूह
व्याख्या
आजादी के इस नए आकाश में उड़ने वाले पक्षियों के नए समूह अर्थात हमारे देश के नए युवाओं को आप एक नई दिशा दीजिए।
नव पर, नव स्वर दे !
शब्दार्थ
पर ~ पंख
स्वर ~ आवाज या बोली
व्याख्या
हे माँ आप इन नए पक्षियों को ऊंची उड़ान भरने के लिए नए पंख और मधुर गीत गाने के लिए नई आवाज का वरदान दीजिए।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
काव्य सौंदर्य :
* रस: कविता में शांत और वीर रस का बहुत सुंदर प्रभाव दिखता है।
* छंद: यह एक मुक्तक छंद की कविता है जिसमें अद्भुत संगीतात्मकता है।
* अलंकार: कविता में अनुप्रास और रूपक अलंकार का बहुत ही सटीक प्रयोग किया गया है।
मूल भाव :
कवि माँ सरस्वती से यह प्रार्थना करता है कि वे भारतवासियों के मन से अज्ञान और गुलामी का गहरा अंधकार पूरी तरह मिटा दें तथा उनमें ज्ञान स्वतंत्रता और नए सृजन का प्रकाश हमेशा के लिए फैला दें।