संध्या-सुंदरी
संध्या - सुंदरी कविता हिंदी साहित्य के महान छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखी गई I यह उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह परिमल से ली गई है। संक्षेप में कहें तो इस कविता के माध्यम से निराला जी…


संध्या - सुंदरी कविता हिंदी साहित्य के महान छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा लिखी गई I यह उनके प्रसिद्ध काव्य संग्रह परिमल से ली गई है। संक्षेप में कहें तो इस कविता के माध्यम से निराला जी यह बताना चाहते हैं कि ढलती हुई शाम जीवन के विश्राम की निशानी है जो हमें दिन भर की थकान से मुक्त कर सुकून देती है। प्रकृति का यह सन्नाटा केवल बाहर ही नहीं होता बल्कि यह हमारे मन की गहराइयों में छिपे दर्द और प्रेम को भी जगाने का काम करता है।

संध्या सुंदरी का आगम :
दिवसावसान का समय
शब्दार्थ
दिवसावसान - दिन के समाप्त होने
व्याख्या
कवि कहतें है कि दिन ढलने और शाम होने का समय हो गया है।
मेघमय आसमान से उतर रही है
शब्दार्थ
मेघमय - बादलों से भरा हुआ
व्याख्या
बादलों से घिरे हुए आकाश से शाम नीचे धरती की ओर आ रही है।
वह संध्या-सुंदरी परी-सी
शब्दार्थ
संध्या सुंदरी - शाम रूपी सुंदर स्त्री
व्याख्या
वह शाम किसी बेहद खूबसूरत आसमान की परी के समान लग रही है।
धीरे-धीरे-धीरे।
शब्दार्थ
धीरे धीरे - बहुत आराम से
व्याख्या
वह सुंदरी बिना किसी जल्दबाजी के बहुत ही खामोशी से नीचे उतर रही है।
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
शब्दार्थ
तिमिरांचल - अंधकार रूपी आंचल
आभास - एहसास या झलक
व्याख्या
उसके फैलते हुए अंधेरे रूपी आंचल में कोई भी हलचल या चंचलता दिखाई नहीं दे रही है, बल्कि हर तरफ शांति है।
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
शब्दार्थ
मधुर - मीठे या सुंदर
अधर - होंठ
व्याख्या
उस शाम रूपी सुंदरी के दोनों होंठ बहुत ही मीठे और आकर्षक लग रहे हैं।
किंतु, गंभीर- नहीं है उनमें हास-विलास।
शब्दार्थ
हास विलास - हंसी मजाक या चंचलता
व्याख्या
लेकिन उन सुंदर होंठों पर कोई चुलबुलापन या हंसी मजाक नहीं है बल्कि एक गहरी शांति और गंभीरता छाई हुई है।

तारों का शृंगार और नीरवता का साथ :
हँसता है तो केवल तारा एक
शब्दार्थ
तारा - आसमान का सितारा
व्याख्या
उस शांत वातावरण में केवल आसमान में चमकता हुआ एक अकेला तारा ही मुस्कुराता हुआ सा प्रतीत होता है।
गूँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,
शब्दार्थ
गूंथा हुआ - सजा हुआ
व्याख्या
वह चमकता हुआ तारा ऐसा लग रहा है जैसे उस सुंदरी के काले घुंघराले बालों में कोई सुंदर फूल सजा दिया गया हो।
हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
शब्दार्थ
अभिषेक - सम्मान या राज्याभिषेक
व्याख्या
वह अकेला तारा चमक कर मानो उस दिलों पर राज करने वाली रानी का सम्मान और स्वागत कर रहा है।
अलसता की-सी लता
शब्दार्थ
अलसता - आलस्य
लता - बेल
व्याख्या
वह शाम थकान और आलस्य से भरी हुई एक कोमल बेल के समान लग रही है।
किंतु कोमलता की वह कली,
शब्दार्थ
कोमलता - मुलायमपन
व्याख्या
आलस्य होने के बावजूद वह एक सुंदर और मुलायम कली की तरह मनमोहक है।
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
शब्दार्थ
सखी - सहेली
नीरवता - पूर्ण शांति या खामोशी
व्याख्या
वह अपनी सबसे करीबी सहेली खामोशी के कंधे पर हाथ रखे हुए बड़े प्यार से आगे बढ़ रही है।
छाँह-सी अंबर-पथ से चली।
शब्दार्थ
छाँह - परछाई
अंबर पथ - आकाश का रास्ता
व्याख्या
वह आसमान के रास्ते से एक हल्की परछाई की तरह चुपचाप धरती की ओर आ रही है।

हर ओर पसरा सन्नाटा :
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
शब्दार्थ
वीणा - एक वाद्य यंत्र
व्याख्या
उस संध्या सुंदरी के हाथों में संगीत पैदा करने वाली कोई वीणा नहीं बज रही है।
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप
शब्दार्थ
अनुराग राग - प्रेम का संगीत
आलाप - स्वर खींचना
व्याख्या
वहां प्रेम का कोई गीत या संगीत के मधुर स्वर भी सुनाई नहीं दे रहे हैं।
नूपुरों में भी रुन-झुन, रुन-झुन,रुन-झुन नहीं,
शब्दार्थ
नूपुर - पायल
व्याख्या
उसके पैरों में पहनी हुई पायलों से भी किसी तरह की रुनझुन या छनछनाहट की आवाज नहीं आ रही है।
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा चुप, चुप, चुप
शब्दार्थ
अव्यक्त - जिसे कहा न जा सके
व्याख्या
वहां तो बस एक ना सुनाई देने वाला गहरा सन्नाटा है जो चुप रहने का इशारा कर रहा है।
है गूँज रहा सब कहीं-
शब्दार्थ
गूंज - फैलना
व्याख्या
और यही शांति और खामोशी का एहसास हर दिशा में फैल चुका है।

प्रकृति के कण-कण में खामोशी का प्रभाव :
व्योममंडल में जगती तल में-
शब्दार्थ
व्योममंडल - आकाश
जगती तल - धरती
व्याख्या
यह गहरी खामोशी विशाल आकाश से लेकर नीचे धरती के हर कोने तक छा गई है।
सोती शांत सरोवर पर उस अमल-कमलिनी-दल में-
शब्दार्थ
सरोवर - तालाब
अमल - स्वच्छ
कमलिनी दल - कमलों का समूह
व्याख्या
शांत तालाब के निर्मल जल में खिले हुए कमलों के समूह भी अब इस शांति में सो गए हैं।
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षःस्थल में-
शब्दार्थ
गर्विता - गर्व करने वाली
सरिता - नदी
वक्षःस्थल - छाती या बीच का भाग
व्याख्या
अपने रूप पर गर्व करने वाली नदी के विशाल और चौड़े फैलाव में भी अब शांति आ गई है।
धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
शब्दार्थ
हिमगिरि - हिमालय पर्वत
अटल - न हिलने वाला
व्याख्या
हिमालय पर्वत की ऊंची गंभीर और कभी ना हिलने वाली चोटियों पर भी वही सन्नाटा छाया हुआ है।
उत्ताल-तरंगाघात-प्रलय-घन-गर्जन-जलधि-प्रबल में-
शब्दार्थ
उत्ताल - ऊंची
तरंगाघात - लहरों की टक्कर
जलधि - समुद्र
व्याख्या
भयंकर लहरों और प्रलय जैसी गर्जना करने वाले शक्तिशाली समुद्र में भी अब शांति का राज है।
क्षिति में-जल में-नभ में-अनिल-अनल में-
शब्दार्थ
क्षिति - धरती
नभ - आकाश
अनिल - हवा
अनल - आग
व्याख्या
धरती पानी आसमान हवा और आग यानी प्रकृति के पांचों तत्वों में वही सन्नाटा समा गया है।

थके जीवों को विश्राम और सपनों की दुनिया :
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा चुप, चुप, चुप
शब्दार्थ
अव्यक्त - बिना बोला हुआ
व्याख्या
पूरी सृष्टि में केवल खामोशी का एक ही स्वर चुप रहने का एहसास फैला रहा है।
है गूँज रहा सब कहीं-
शब्दार्थ
गूंज रहा - सुनाई दे रहा
व्याख्या
चारों तरफ बस इसी शांति का साम्राज्य स्थापित हो गया है।
और क्या है ? कुछ नहीं।
शब्दार्थ
कुछ नहीं - कुछ भी शेष न रहना
व्याख्या
इस गहरी खामोशी के अलावा अब इस दुनिया में और कुछ भी शेष नहीं बचा है।
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
शब्दार्थ
मदिरा - शराब या नशा
व्याख्या
यह शाम अपने साथ नींद और खुमारी की एक ऐसी नदी बहाकर लाती है जिसमें सब डूबने लगते हैं।
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
शब्दार्थ
जीव - प्राणी
सस्नेह - प्रेम के साथ
व्याख्या
दिन भर के काम से थके हारे सभी प्राणियों को वह बहुत ही प्रेम से अपने पास बुलाती है।
प्याला एक पिलाती,
शब्दार्थ
प्याला - पीने का बर्तन
व्याख्या
और उन्हें नींद व आराम का एक मीठा प्याला पिलाकर सारी थकान दूर कर देती है।
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
शब्दार्थ
अंक - गोद
व्याख्या
वह शाम सभी थके हुए जीवों को एक मां की तरह अपनी प्यार भरी गोद में सुला लेती है।
दिखलाती फिर विस्मृति के वह कितने मीठे सपने।
शब्दार्थ
विस्मृति - सब कुछ भूल जाना
व्याख्या
और दुनिया के सारे दुखों को भुलाकर उन्हें नींद में बहुत प्यारे और मीठे सपने दिखाती है।

रात्रि का प्रभाव और कवि के हृदय से विहाग का जन्म :
अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती है वह लीन,
शब्दार्थ
अर्द्धरात्रि - आधी रात
निश्चलता - बिना हिले डुले स्थिर होना
लीन - मगन हो जाना
व्याख्या
धीरे धीरे यह शाम आधी रात के गहरे और स्थिर सन्नाटे में पूरी तरह समा जाती है और गायब हो जाती है।
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
शब्दार्थ
अनुराग - प्रेम
व्याख्या
आधी रात के उस एकांत में कवि के मन में प्रकृति और अपनी प्रेयसी के प्रति प्रेम अचानक बढ़ जाता है।
विरहाकुल कमनीय कंठ से
शब्दार्थ
विरहाकुल - बिछड़ने के दुख से व्याकुल
कमनीय - सुंदर
कंठ - गला
व्याख्या
किसी अपने से दूर होने के गहरे दुख और दर्द से भरे हुए कवि के सुंदर गले से।
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।
शब्दार्थ
आप - अपने आप
विहाग - आधी रात में गाया जाने वाला वियोग का राग
व्याख्या
आधी रात के समय गाया जाने वाला एक दर्द भरा गीत अचानक अपने आप ही फूट पड़ता है।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
काव्य सौंदर्य :
* रस - कविता में शांत रस और अंत में वियोग श्रृंगार रस की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।
* छंद - यह कविता मुक्तक छंद में रची गई है जो निराला जी की विशेष पहचान है।
* अलंकार - संध्या सुंदरी परी सी तथा छाँह सी में उपमा अलंकार है तथा मेघमय आसमान से उतर रही है संध्या सुंदरी में मानवीकरण अलंकार का श्रेष्ठ प्रयोग है। चुप चुप चुप और धीरे धीरे में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
मूल भाव :
प्रकृति के शांत रूप का मनुष्य के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और एकांत का यह सन्नाटा व्यक्ति को अपने भीतर छिपे प्रेम और दर्द से जोड़ देता है। दिन भर के संघर्षों के बाद शांति और विश्राम ही मनुष्य के थके हुए जीवन को फिर से ऊर्जा और नए सपने प्रदान करता है।