समास
पाणिनि के अनुसार - "समसनं समासः"। अर्थात्, जब अनेक पद मिलकर एक हो जाते हैं, तो उस प्रक्रिया को समास कहते हैं।



पाणिनि के अनुसार - "समसनं समासः"।
अर्थात्, जब अनेक पद मिलकर एक हो जाते हैं, तो उस प्रक्रिया को समास कहते हैं।
अर्थ और परिभाषा :
समास शब्द का निर्माण दो शब्दों के योग से हुआ है, सम् + आस। सम् का अर्थ संक्षिप्त और आस का अर्थ बैठना, अर्थात इसका शाब्दिक अर्थ होता है - संक्षेप करना या संक्षिप्तीकरण।
परिभाषा :
दो या दो से अधिक शब्दों के परस्पर मेल से बने सार्थक एवं स्वतंत्र शब्द को समास कहते हैं।
अथवा
दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने से एक नया और छोटा सार्थक शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं।
पाणिनि के अनुसार - "समसनं समासः"। अर्थात्, जब अनेक पद मिलकर एक हो जाते हैं, तो उस प्रक्रिया को समास कहते हैं।
समास से संबंधित मुख्य तत्व:
1. समस्त पद या सामासिक पद: समास के नियमों से बने नए शब्द को समस्त पद कहा जाता है, जैसे - राजपुत्र।
2. पूर्वपद और उत्तरपद: समास में मुख्य रूप से दो पद होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे या अंतिम पद को उत्तरपद कहा जाता है, जैसे - राजपुत्र में- राज पूर्वपद तथा पुत्र उत्तरपद।
समास-विग्रह: समस्त पद के सभी पदों को अलग-अलग करके उनके बीच के संबंध को स्पष्ट करने की विधि को समास-विग्रह कहते हैं,जैसे-राजपुत्र का विग्रह- राजा का पुत्र।
समास के प्रमुख भेद :
पदों की प्रधानता के आधार पर समास के मुख्य रूप से 6 भेद माने जाते हैं-
सूत्र - अब तक दादा 6 समास।
1. अ अव्ययीभाव समास (पूर्वपद प्रधान)
2. ब बहुव्रीहि समास (अन्य पद प्रधान)
3. त तत्पुरुष समास (उत्तरपद प्रधान)
4.क कर्मधारय समास (विशेषण-विशेष्य या उपमेय - उपमान संबंध )
5. दा द्वंद्व समास (दोनों पद प्रधान)
6. दा द्विगु समास (पूर्वपद संख्यावाचक)
नोट : मुख्यतः समास के चार भेद होते हैं। तत्पुरुस समास के दो उपभेद हैं - 1. कर्मधारय समास और 2. द्विगु समास।
1. अव्ययीभाव समास :
जिस समस्त पद का पूर्वपद प्रधान होते हुए भी उपसर्ग या अविकारी शब्द हो, तो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
या
जिस समास में पहला पद प्रधान हो और पूरा सामासिक पद एक अव्यय की तरह काम करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
पहचान:
1. पूर्वपद में प्राय प्रति, आ, भर, यथा, अनु, बे, यावत्, हर, बा आदि उपसर्ग या अव्यय आते हैं।
2. एक ही शब्द की पुनरावृत्ति होने पर भी अव्ययीभाव समास होता है।
समस्त पद समास-विग्रह
प्रतिदिन - प्रत्येक दिन या दिन-दिन
आजन्म - जन्म से लेकर
यथाशक्ति - शक्ति के अनुसार
भरपेट - पेट भरकर
यथासंभव - जैसा संभव हो
आमरण - मरण तक
यथाक्रम - क्रम के अनुसार
प्रत्यक्ष - अक्षि (आँख) के आगे
दिनोंदिन - दिन-पर-दिन
निःसंदेह - संदेह के बिना
2. तत्पुरुष समास :
जिस सामासिक पद में उत्तरपद प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच आने वाले कारक-चिह्नों या विभक्तियों का लोप हो जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।
कारक-चिह्नों के लोप के आधार पर तत्पुरुष समास के 6 प्रमुख भेद होते हैं-
(क) कर्म तत्पुरुष समास (द्वितीया तत्पुरुष):
पहचान: इसमें दोनों पदों के बीच से कर्म कारक के चिह्न 'को' का लोप होता है।
उदाहरण:
गगनचुंबी = गगन को चूमने वाला
यशप्राप्त = यश को प्राप्त
माखनचोर = माखन को चुराने वाला
ग्रामगत = ग्राम (गाँव) को गया हुआ
जेबकतरा = जेब को कतरने वाला
(ख) करण तत्पुरुष समास (तृतीया तत्पुरुष):
पहचान: इसमें करण कारक के चिह्न 'से' या 'के द्वारा' (साधन के अर्थ में) का लोप होता है।
उदाहरण:
हस्तलिखित = हाथ से (द्वारा) लिखित
तुलसीकृत = तुलसीदास द्वारा रचित (कृत)
शोकाकुल = शोक से आकुल
रेखांकित = रेखा से अंकित
नेत्रहीन = नेत्र से हीन
(ग) संप्रदान तत्पुरुष समास (चतुर्थी तत्पुरुष):
पहचान: इसमें संप्रदान कारक के चिह्न 'के लिए' का लोप होता है।
उदाहरण:
रसोईघर = रसोई के लिए घर
देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
गौशाला = गायों के लिए शाला या स्थान
सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रह
(घ) अपादान तत्पुरुष समास (पंचमी तत्पुरुष):
पहचान: इसमें अपादान कारक के चिह्न 'से' (अलग होने, भय, हीनता या दूरी के भाव में) का लोप होता है।
उदाहरण :
ऋणमुक्त = ऋण से मुक्त
पथभ्रष्ट = पथ (मार्ग) से भ्रष्ट
धनहीन = धन से हीन
जन्मांध = जन्म से अंधा
पदच्युत = पद से हटाया हुआ (च्युत)
(ङ) संबंध तत्पुरुष समास (षष्ठी तत्पुरुष):
पहचान: इसमें संबंध कारक के चिह्न 'का', 'के', 'की' का लोप होता है।
उदाहरण:
राजपुत्र = राजा का पुत्र
सेनापति = सेना का पति (प्रमुख)
गंगाजल = गंगा का जल
पराधीन = पर (दूसरों) के अधीन
घुड़दौड़ = घोड़ों की दौड़
(च) अधिकरण तत्पुरुष समास (सप्तमी तत्पुरुष):
पहचान: इसमें अधिकरण कारक के चिह्न 'में' या 'पर' का लोप होता है।
उदाहरण:
पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम
आपबीती = आप (स्वयं) पर बीती
वनवास = वन में वास
घुड़सवार = घोड़े पर सवार
(छ) नञ् तत्पुरुष समास :
पहचान: जिस तत्पुरुष समास का पूर्वपद नकारात्मक हो, प्रायः अ, अन, न, ना से प्रारंभ हो।
उदाहरण:
अधर्म = न धर्म
अनहोनी = न होनी
अनंत = जिसका अंत न हो (न अंत)
अन्याय = न न्याय

3. कर्मधारय समास :
जिस समस्त पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद और उत्तरपद के बीच विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
पहचान: विग्रह करने पर पदों के बीच 'है जो' या 'के समान' अथवा 'रूपी' शब्द आते हैं, जैसे -
समस्त पद - समास-विग्रह> संबंध
महात्मा - महान है जो आत्मा> विशेषण-विशेष्य
नीलगगन- नीला है जो गगन> विशेषण-विशेष्य
पीतांबर - पीला है जो अंबर (वस्त्र)> विशेषण-विशेष्य
सज्जन - सत् (अच्छा) है जो जन > विशेषण-विशेष्य
कालीमिर्च - काली है जो मिर्च> विशेषण-विशेष्य
चरणकमल - कमल के समान चरण> उपमान-उपमेय
चंद्रमुख - चंद्रमा के समान मुख> उपमान-उपमेय
कनकलता - कनक (स्वर्ण) के समान लता> उपमान-उपमेय
विद्याधन विद्या रूपी धन उपमान-उपमेय
नृसिंह - सिंह के समान नर> उपमान-उपमेय
4. द्विगु समास :
जिस समस्त पद का पहला पद संख्यावाचक विशेषण हो और किसी समूह का ज्ञान कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं। इसमें उत्तरपद प्रधान होता है।
पहचान: पहला पद संख्या का बोध कराता है और विग्रह के अंत में 'का समूह' या 'का समाहार' आता है।
समस्त पदसमास-विग्रह
चौराहा - चार राहों का समूह
त्रिफला - तीन फलों का समाहार
पंचवटी-पाँच वटों (वृक्षों) का समूह
सप्ताह - सात दिनों (अहों) का समूह
नवरत्न - नौ रत्नों का समूह
शताब्दी - सौ वर्षों (अब्दों) का समाहार
दोपहर - दो पहरों का समाहार
त्रिलोक - तीन लोकों का समाहार
चौमासा - चार मासों (महीनों) का समूह
5. द्वंद्व समास :
जिस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों समान रूप से प्रधान होते हैं, उसे द्वंद्व समास कहते हैं।
पहचान:
1. इनके बीच प्राय योजक चिह्न (-) लगा होता है। विग्रह करने पर दोनों के बीच 'और', 'तथा', 'या', 'अथवा' जैसे समुच्चयबोधक अव्यय आते हैं।
2. समानता का प्रतीक।
द्वंद्व समास के भेद: द्वंद्व समास केवल शब्दों को जोड़ता नहीं है, बल्कि यह भावों के आधार पर तीन उप-प्रकारों में बँटा होता है-
1. इतरेतर द्वंद्व :
इतर शब्द का अर्थ है- अन्य या दूसरा। जहाँ दोनों शब्द अलग-अलग होते हुए भी एक साथ अपना पूरा महत्व रखते हों। साधारण शब्दों में कहें तो, जहाँ दोनों चीजें एक साथ मौजूद हों और दोनों ज़रूरी हों। इसमें कोई किसी का विरोधी नहीं होता।
दोनों शब्दों का स्वतंत्र अस्तित्व होता है और विग्रह करते समय बीच में 'और' या 'तथा' लगता है, जैसे -
भाई-बहन = भाई और बहन (दोनों का एक साथ महत्व है)
राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण
देश-विदेश = देश और विदेश
अन्न-जल = अन्न और जल
2. वैकल्पिक द्वंद्व :
जहाँ दोनों शब्द एक-दूसरे के विपरीत हों। इसे विलोम शब्द भी कह सकते हैं, जैसे - आप एक ही समय में दोनों नहीं चुन सकते, आपको एक 'विकल्प' चुनना होगा।
विग्रह करते समय बीच में 'या' अथवा 'अथवा' लगता है, जैसे -
पाप-पुण्य = पाप या पुण्य (एक बार में व्यक्ति या तो पाप करेगा या पुण्य)
हानि-लाभ = हानि या लाभ
जीवन-मरण = जीवन या मरण
थोड़ा-बहुत = थोड़ा या बहुत
3. समाहार द्वंद्व :
समाहार का अर्थ होता है-समूह या इकट्ठा करना। यहाँ लिखे गए शब्द केवल अपना ही अर्थ नहीं बताते, बल्कि अपने जैसी अन्य चीजों के पूरे समूह की ओर इशारा करते हैं।
विग्रह करते समय अंत में 'आदि' या 'इत्यादि' लगाया जाता है, जैसे -
दाल-रोटी = दाल, रोटी आदि
(अर्थात्: जब कोई कहता है "दाल-रोटी चल रही है", तो उसका मतलब केवल दो चीजों से नहीं, बल्कि पूरे 'भोजन' से होता है।)
रुपया-पैसा = रुपया, पैसा आदि
(अर्थात्: धन या संपत्ति)
हाथ-पाँव = हाथ, पाँव आदि
(अर्थात्: "हाथ-पाँव बचाकर काम करना" का मतलब पूरे शरीर को बचाना है, सिर्फ हाथ और पाँव को नहीं।)
चाय-पानी = चाय, पानी आदि
(अर्थात्: मेहमान का सत्कार, जिसमें बिस्कुट या नाश्ता भी शामिल हो सकता है।)
विशेष नियम :
द्वंद्व का प्रकार गणितीय सूत्र योजक शब्द पहचान
इतरेतर EK A + B दोनों साथ-साथ
वैकल्पिक A / B दोनों में से एक (विलोम)
समाहार A, B etc.आदि - पूरा समूह या कैटेगरी
एकशेष A + B = A एक में ही दोनों समाहित
4. एकशेष द्वंद्व समास :
जहाँ समास होने पर केवल एक ही शब्द शेष बचे।
या
जब द्वंद्व समास में दो या दो से अधिक शब्दों का मेल होता है, लेकिन उनमें से केवल एक ही शब्द शेष रहता है और वह अकेला बचा हुआ शब्द दोनों शब्दों का अर्थ एक साथ प्रकट करता है, तो उसे 'एकशेष द्वंद्व समास' कहते हैं।
पहचान :
1. इसमें प्रायः स्त्रीलिंग और पुल्लिंग शब्दों का जोड़ा होता है।
2. जब दोनों शब्द जुड़ते हैं, तो स्त्रीलिंग शब्द लुप्त हो जाता है और केवल पुल्लिंग शब्द ही शेष बचता है।
3. जो एक शब्द बचता है, वह एकवचन से बदलकर 'द्विवचन' में आ जाता है, ताकि यह साबित हो सके कि इसके भीतर दो लोग छिपे हैं।
पितरौ - माता और पिता (हिन्दी में), माता च पिता च (संस्कृत में), ='माता' लुप्त हो गई, 'पिता' द्विवचन में 'पितरौ' बन गया।
भ्रातरौ - भाई और बहन (हिन्दी में), भ्राता च स्वसा च (संस्कृत में), =बहन यानी स्वसा लुप्त हो गई, 'भाई' ने दोनों का अर्थ ले लिया।
पुत्रौ - पुत्र और पुत्री (हिन्दी में), पुत्रश्च दुहिता च, (संस्कृत में), =पुत्री यानी दुहिता लुप्त हो गई, केवल 'पुत्र' शेष रहा।
हंसौ - हंस और हंसिनी (हिन्दी में), हंसश्च हंसी च (संस्कृत में), =हंसिनी लुप्त हो गई, 'हंस' द्विवचन बन गया।

6. बहुव्रीहि समास :
जिस सामासिक शब्द में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों ही गौण हों, और वे दोनों मिलकर किसी तीसरे या विशेष अर्थ का निर्माण करें, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
सूत्र: "अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः" अर्थात जहाँ अन्य पद के अर्थ की प्रधानता हो।
नियम :
बहुव्रीहि समास को पहचानने और विग्रह करने के लिए निम्नलिखित 4 नियमों का पालन किया जाता है-
नियम 1: तीसरे अर्थ की अनिवार्यता :
दोनों शब्दों को जोड़ने के बाद जो अर्थ निकलेगा, वह किसी विशिष्ट व्यक्ति, ईश्वर, वस्तु या प्राणी के लिए रूढ़ हो चुका होगा, जैसे- 'दशानन' का मतलब सिर्फ रावण है, कोई भी दस सिर वाला व्यक्ति नहीं।
नियम 2: विग्रह की शैली :
जब आप इसका विग्रह या विस्तार करेंगे, तो वाक्य के अंत में हमेशा संबंधसूचक शब्द लगाएँगे, जैसे- "जिसका", "जिसकी", "जिसके", "वाला है जो" आदि।
नियम 3: कोष्ठक का प्रयोग :
विग्रह करने के बाद वह 'तीसरा अर्थ' क्या है, इसे स्पष्ट करने के लिए अंत में अर्थात् (...) लिखकर कोष्ठक में उस विशेष व्यक्ति या वस्तु का नाम लिखना व्याकरणिक रूप से अनिवार्य है।
नियम 4: सर्वोच्च प्राथमिकता :
यदि कोई शब्द बहुव्रीहि और किसी अन्य समास जैसे कर्मधारय या द्विगु दोनों के नियमों में फिट बैठता है, तो व्याकरण में हमेशा बहुव्रीहि समास को ही सही माना जाएगा। उदा: 'त्रिनेत्र' द्विगु भी हो सकता है, लेकिन शिव का बोध कराने के कारण यह मुख्य रूप से बहुव्रीहि है।
विभक्ति या कारक चिह्न के आधार पर बहुव्रीहि समास को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है- समानाधिकरण और व्यधिकरण।
1. समानाधिकरण बहुव्रीहि :
जब हम समास का विग्रह करते हैं, तो पूर्वपद और उत्तरपद दोनों एक ही विभक्ति में, आमतौर पर दोनों 'प्रथमा विभक्ति' या कर्ता कारक में होते हैं। इसमें पहला पद अक्सर विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है।
पहचान: विग्रह करने पर दोनों शब्दों के बीच कोई अतिरिक्त कारक चिह्न में, पर, से, का, नहीं आता।
समस्त पद - समास-विग्रह - अन्य पद या रूढ़ अर्थ
पीतांबर - पीला है अंबर (वस्त्र) जिसका - अर्थात् भगवान विष्णु
नीलकंठ - नीला है कंठ (गला) जिसका - अर्थात् भगवान शिव
दशानन - दश हैं आनन (मुख) जिसके - अर्थात् रावण
लंबोदर - लंबा है उदर (पेट) जिसका - अर्थात् भगवान गणेश
श्वेतांबर - श्वेत (सफ़ेद) हैं अंबर जिसके - अर्थात् देवी सरस्वती
दिगंबर - दिशाएँ ही हैं अंबर (वस्त्र) जिसके - अर्थात् भगवान शिव
त्रिलोचन - तीन हैं लोचन (आँखें) जिसके - अर्थात् भगवान शिव
चतुर्भुज - चार हैं भुजाएँ जिसकी - अर्थात् भगवान विष्णु
मीनाक्षी - मीन (मछली) के समान अक्षि (आँखें) हैं जिसकी - अर्थात् एक विशेष देवी
गजानन - गज (हाथी) के समान आनन (मुख) है जिसका - अर्थात् भगवान गणेश
2. व्यधिकरण बहुव्रीहि :
जहाँ विग्रह करते समय दोनों पदों की विभक्तियाँ अलग-अलग होती हैं, और उनके बीच कोई कारक चिह्न जैसे- में, पर, को आदि स्पष्ट रूप से आता है।
समस्त पद - समास-विग्रह - अन्य पद या रूढ़ अर्थ
चक्रपाणि - चक्र है पाणि (हाथ) में जिसके - अर्थात् भगवान विष्णु
वीणापाणि - वीणा है पाणि में जिसके - अर्थात् देवी सरस्वती
चंद्रशेखर - चंद्र है शिखर (सिर) पर जिसके - अर्थात् भगवान शिव
चंद्रमौलि - चंद्र है मौलि (मस्तक) पर जिसके - अर्थात् भगवान शिव
शूलपाणि - शूल (त्रिशूल) है पाणि (हाथ) में जिसके - अर्थात् भगवान शिव
वज्रपाणि - वज्र है पाणि (हाथ) में जिसके - अर्थात् देवराज इंद्र
गिरिधर - गिरि (पर्वत) को धारण करने वाले हैं जो - अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण
मुरलीधर - मुरली को धारण करने वाले हैं जो - अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण
कमलनयन - कमल के समान नयन हैं जिसके - अर्थात् भगवान विष्णु / राम
कर्मधारय और बहुव्रीह समास मे अंतर :
1. कर्मधारय समास मेंदूसरा शब्द प्रधान होता है,जबकि बहुव्रीह समास मेंकोई पद प्रधान न होकर, तीसरा पद प्रधान होता है।
2. कर्मधारय समास में दोनों शब्दों के बीच विशेषण-विशेष्य का संबंध होता है, जबकि बहुव्रीह समास में दोनों शब्द मिलकर किसी तीसरे व्यक्ति या वस्तु के विशेषण बन जाते हैं।
3. कर्मधारय समास में अर्थ केवल दिए गए शब्दों तक ही सीमित रहता है, जबकि बहुव्रीह समास में अपना सामान्य अर्थ छोड़कर विशिष्ट अर्थ देते हैं।
4. कर्मधारय समास में विग्रह के बीच में है जो या के समान आता है, जबकि बहुव्रीह समास में विग्रह के अंत में जिसका या जिसके या वाला है जो के साथ तीसरा नाम आता है।
उदाहरण : पीतांबर
कर्मधारय का विग्रह- पीला है जो अंबर (वस्त्र)
यहाँ सिर्फ एक पीले कपड़े की बात हो रही है।
बहुव्रीहि का विग्रह- पीले हैं अंबर (वस्त्र) जिसके, अर्थात् विष्णु
यहाँ कपड़े की नहीं, भगवान विष्णु की बात हो रही है।
परीक्षा के लिए Golden Rule :
यदि किसी परीक्षा में कोई ऐसा शब्द आता है जैसे- दशानन, पीतांबर, नीलकंठ आदि जो कर्मधारय और बहुव्रीहि दोनों हो सकता है, और विकल्पों में दोनों समास दिए गए हैं, तो बहुव्रीहि समास को ही सही उत्तर चुनना चाहिए।
कारण: व्याकरण में किसी सामान्य अर्थ (कर्मधारय) की तुलना में विशेष अर्थ (बहुव्रीहि) को हमेशा उच्च प्राथमिकता दी जाती है। बहुव्रीहि सभी समासों का राजा माना जाता है।