साखी
प्रिय विद्यार्थियों, प्रस्तुत साखियाँ दोहा छंद में लिखी गयी हैं और इनके रचयिता निर्गुण भक्ति शाखा के प्रमुख संत कवि कबीरदास जी हैं। इन साखियों में कबीर जी ने गुरु की महत्ता, ईश्वर के नाम का स्मरण, ज्ञ…


प्रिय विद्यार्थियों,
प्रस्तुत साखियाँ दोहा छंद में लिखी गयी हैं और इनके रचयिता निर्गुण भक्ति शाखा के प्रमुख संत कवि कबीरदास जी हैं। इन साखियों में कबीर जी ने गुरु की महत्ता, ईश्वर के नाम का स्मरण, ज्ञान की प्राप्ति, जीवात्मा-परमात्मा के एकाकार और अहंकार के त्याग का बहुत ही मार्मिक और गहरा वर्णन किया है।

गुरु की असीम महिमा और उपकार :
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौ हाड़ी कै बार।
शब्दार्थ-
बलिहारी ~ न्योछावर होना
आपणैं ~ अपने
द्यौ हाड़ी ~ एक दिन में
कै बार ~ कितनी ही बार
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैं अपने सच्चे गुरु पर एक दिन में अनगिनत बार खुद को न्योछावर करने के लिए तैयार हूँ।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।। 1 ।।
शब्दार्थ-
जिनि ~ जिन्होंने
मानिष ~ मनुष्य
बार ~ देर या समय
व्याख्या : क्योंकि मेरे गुरु ने अपने ज्ञान से मुझे साधारण मनुष्य से देवता के समान दिव्य गुणों वाला बनाने में जरा सी भी देर नहीं लगाई।
सतगुरु की महिमा अनन्त, अनन्त किया उपगार।
शब्दार्थ-
अनन्त ~ जिसका कोई अंत न हो
उपगार ~ उपकार
व्याख्या : सच्चे गुरु की महिमा असीम है और उन्होंने अज्ञान के अंधकार से निकालकर मुझ पर अनंत उपकार किए हैं।
लोचन अनँत उघाड़िया, अनन्त दिखावणहार।। 2 ।।
शब्दार्थ-
लोचन ~ आँखें
उघाड़िया ~ खोल दिए
दिखावणहार ~ दर्शन कराने वाला
व्याख्या : गुरु ने मेरे भीतर छिपे ज्ञान के अनंत नेत्र खोल दिए हैं, जिससे मैं उस अनंत और असीम ईश्वर के दर्शन कर पा रहा हूँ।
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
शब्दार्थ-
दीपक ~ ज्ञान रूपी दीया
अघट्ट ~ जो कभी न घटे
व्याख्या : गुरु ने मुझे ज्ञान रूपी ऐसा दीपक दिया है, जिसमें ईश्वरीय प्रेम रूपी तेल भरा है और कभी न खत्म होने वाली लगन की बत्ती डाल दी है।
पूरा किया बिसाहुणाँ, बहुरि न आवौं हट्ट।। 3 ।।
शब्दार्थ-
बिसाहुणाँ ~ सांसारिक लेन-देन या क्रय-विक्रय
बहुरि ~ दोबारा
हट्ट ~ बाजार
व्याख्या : इस ज्ञान के प्रकाश में मैंने अपना सांसारिक लेन-देन पूरा कर लिया है और अब मुझे जन्म-मरण के इस संसार रूपी बाजार में दोबारा लौटकर नहीं आना पड़ेगा।
बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि।
शब्दार्थ-
बूड़े ~ डूब गए थे
ऊबरे ~ बच गए
लहरि ~ कृपा की लहर
व्याख्या : मैं तो अज्ञान के भवसागर में डूब ही गया था परंतु गुरु की कृपा रूपी लहर चमकने से मैं डूबने से बच गया।
भेरा देख्या जरजरा, ऊतरि पड़े फरंकि।। 4 ।।
शब्दार्थ-
भेरा ~ नाव
जरजरा ~ पुराना और कमजोर
फरंकि ~ तुरंत उछलकर
व्याख्या : जब मैंने ज्ञान के प्रकाश में देखा कि मेरी सांसारिक नाव बहुत कमजोर है तो मैं तुरंत छलांग लगाकर उससे नीचे उतर गया।

ईश्वर नाम स्मरण और जीव की चेतावनी :
चिंता तौ हरि नाँव की, और न चिंता दास।
शब्दार्थ-
चिंता ~ फिक्र या चिंतन
हरि नाँव ~ भगवान का नाम
व्याख्या : ईश्वर के सच्चे सेवक को हमेशा केवल भगवान के नाम का ही चिंतन रहता है और उसे अन्य किसी बात की फिक्र नहीं होती।
जे कछु चितवै राम बिन, सोइ काल कौ पास।। 5 ।।
शब्दार्थ-
चितवै ~ सोचता है
काल ~ मृत्यु
पास ~ जाल या बंधन
व्याख्या : ईश्वर के नाम के अलावा जो कुछ भी सोचा जाता है वह सब मनुष्य को मृत्यु और माया के जाल में ही फँसाता है।
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न तूँ।
शब्दार्थ-
तूँ तूँ ~ तेरा नाम लेते-लेते
भया ~ हो गया
व्याख्या : हे ईश्वर तुम्हारा नाम रटते-रटते मैं तुम्हारे ही स्वरूप में ढल गया हूँ और मेरे भीतर का सारा अहंकार समाप्त हो गया है।
बारी फेरी बलि गई, जित देखौँ तित तूँ।। 6 ।।
शब्दार्थ-
बारी फेरी ~ जन्म-मरण का चक्कर
बलि गई ~ जल गई या खत्म हो गई
जित ~ जिधर
व्याख्या : अहंकार मिटने से मेरे जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो गया है और अब मैं जिधर भी देखता हूँ उधर केवल तुम ही नजर आते हो।
कबीर सूता क्या करै, काहे न देखे जागि।
शब्दार्थ-
सूता ~ सोया हुआ
जागि ~ जागकर
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि अज्ञान की नींद में सोकर तुम अपना जीवन क्यों नष्ट कर रहे हो तुम ज्ञान की अवस्था में जागकर सत्य को क्यों नहीं देखते।
जाका सँग तैं बीछुड़्या, ताही के सँग लागि।। 7 ।।
शब्दार्थ-
जाका सँग ~ जिसके साथ से
बीछुड़्या ~ अलग हुआ है
व्याख्या : हे जीवात्मा तू अज्ञानवश जिस परमात्मा से बिछड़ गया है, अब जागकर वापस उसी परमात्मा के ध्यान में क्यों नहीं लग जाता।
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सोइयै असरार।
शब्दार्थ-
केसौ ~ केशव या ईश्वर
कूकिये ~ पुकारिए
असरार ~ आलस्य में
व्याख्या : हमें हमेशा केशव का नाम लेकर पुकारते रहना चाहिए और आलस्य में पड़कर अज्ञान की नींद कभी नहीं सोना चाहिए।
राति दिवस कै कूकणौ, कबहुँ लगै पुकार।। 8 ।।
शब्दार्थ-
राति दिवस ~ रात दिन
कूकणौ ~ पुकारने से
व्याख्या : रात-दिन लगातार सच्चे मन से पुकारने पर कभी न कभी तो तुम्हारी सच्ची पुकार भगवान तक जरूर पहुँचेगी।
लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु भार।
शब्दार्थ-
मारग ~ रास्ता
विकट ~ कठिन
भार ~ लुटेरे या बाधाएं
व्याख्या : परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बहुत लंबा है और रास्ता अत्यंत कठिन है जिसमें काम-क्रोध रूपी बहुत से लुटेरे बैठे हैं।
कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि दीदार।। 9 ।।
शब्दार्थ-
क्यूँ पाइये ~ कैसे प्राप्त हो
दुर्लभ ~ जो आसानी से न मिले
दीदार ~ दर्शन
व्याख्या : कबीरदास जी संतों से पूछते हैं कि ऐसे कठिन और बाधाओं से भरे हालात में भगवान के वे दुर्लभ दर्शन भला कैसे प्राप्त हो सकते हैं।
यहूँ तन जारौ मसि करौ, लिखौ राम का नाउँ।
शब्दार्थ-
जारौ ~ जलाकर
मसि ~ स्याही
नाउँ ~ नाम
व्याख्या : परमात्मा के विरह में तड़पती आत्मा कहती है कि मैं अपने इस शरीर को जलाकर स्याही बना लूँ और उससे राम का नाम लिखूँ।
लेखणि करूँ करंक की, लिखि-लिखि राम पठाउँ।। 10 ।।
शब्दार्थ-
लेखणि ~ कलम
करंक ~ हड्डियां
पठाउँ ~ भेजूँ
व्याख्या : मैं अपनी हड्डियों को घिसकर उनकी कलम बनाऊँ और राम का नाम लिख-लिखकर प्रभु के पास भेजती रहूँ ताकि वे मेरी पीड़ा समझें।
कै बिरहनि कूँ मींच दे, कै आपा दिखलाइ।
शब्दार्थ-
बिरहनि ~ वियोग में तड़पने वाली आत्मा
मींच ~ मृत्यु
आपा ~ अपना स्वरूप
व्याख्या : हे ईश्वर या तो वियोग में तड़पती हुई इस आत्मा को मौत दे दीजिए या फिर सामने आकर अपने साक्षात दर्शन दे दीजिए।
आठ पहर का दाझणां, मोपै सह्या न जाइ।। 11 ।।
शब्दार्थ-
आठ पहर ~ पूरे चौबीस घंटे
दाझणां ~ जलना
मोपै ~ मुझसे
व्याख्या : मुझसे अब दिन-रात विरह की आग में इस तरह लगातार जलना बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं होता है।

अनन्य भक्ति और योग साधना की सर्वोच्च अवस्था :
कबिरा रेख सिंदूर की, काजल दिया न जाइ।
शब्दार्थ-
रेख सिंदूर की ~ सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक
काजल ~ सांसारिक विषय-वासना
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि माथे पर जहाँ प्रेम के प्रतीक सिंदूर की लाल रेखा लगाई जाती है वहाँ काला काजल नहीं लगाया जा सकता।
नैनूं रमइया रमि रह्या, दूजा कहाँ समाइ।। 12 ।।
शब्दार्थ-
नैनूं ~ आँखों में
रमइया ~ ईश्वर
व्याख्या : उसी तरह मेरी आँखों में तो मेरे राम बस गए हैं इसलिए अब इन आँखों में किसी अन्य सांसारिक वस्तु के लिए कोई जगह नहीं बची है।
सागर नाहीं सीप बिन, स्वांति बूँद भी नाहिं।
शब्दार्थ-
सागर ~ समुद्र
स्वांति बूँद ~ स्वाति नक्षत्र की बूँद
व्याख्या : शरीर के शून्य शिखर रूपी ब्रह्मांड में योग साधना की उस अवस्था में न तो समुद्र है न सीप है और न ही स्वाति नक्षत्र की बूँद है।
कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माहिं।। 13 ।।
शब्दार्थ-
नीपजै ~ उत्पन्न होता है
सुन्नि सिषर ~ शून्य शिखर या सहस्रार चक्र
माहिं ~ में
व्याख्या : फिर भी योग साधना के बल पर उस शून्य शिखर रूपी किले में मोक्ष रूपी अद्भुत मोती उत्पन्न हो रहा है।
पाणी ही तैं हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाइ।
शब्दार्थ-
पाणी ~ पानी
हिम ~ बर्फ
बिलाइ ~ पिघलकर गायब हो जाना
व्याख्या : पानी जमकर जिस प्रकार बर्फ का रूप ले लेता है और फिर पिघलकर वापस पानी में ही मिल जाता है।
जो कुछ था सोई भया, अब कछु कहा न जाइ।। 14 ।।
शब्दार्थ-
सोई भया ~ वही बन गया
कहा न जाइ ~ शब्दों में नहीं बताया जा सकता
व्याख्या : उसी प्रकार यह जीवात्मा भी परमात्मा का ही अंश है और अंत में उसी में विलीन हो जाती है जिसके बारे में शब्दों में कुछ नहीं कहा जा सकता।
पंखि उडाणीं गगन कूँ, पेंड रह्या परदेस।
शब्दार्थ-
पंखि ~ पक्षी रूपी जीवात्मा
गगन ~ आकाश या शून्य चक्र
पेंड ~ शरीर
व्याख्या : पक्षी रूपी जीवात्मा योग साधना के द्वारा आकाश रूपी सहस्रार चक्र में पहुँच गई और उसका भौतिक शरीर इसी संसार रूपी परदेश में रह गया।
पाणी पीया चंच बिन, भूलि गया यहु देस।। 15 ।।
शब्दार्थ-
पाणी ~ ब्रह्मानंद रूपी अमृत जल
चंच ~ चोंच या इंद्रियां
व्याख्या : वहाँ जीवात्मा ने बिना इंद्रियों के ब्रह्मानंद रूपी अमृत का पान किया और इस सांसारिक देश को पूरी तरह भूल गई।
पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास।
शब्दार्थ-
पिंजर ~ शरीर रूपी पिंजरा
अंतरि ~ हृदय के भीतर
उजास ~ प्रकाश
व्याख्या : ईश्वर का साक्षात्कार होते ही शरीर रूपी पिंजरे के भीतर प्रेम का प्रकाश फैल गया और हृदय में असीम उजाला हो गया।
मुख कसतूरी महमहीं, बाणी फूटी बास।। 16 ।।
शब्दार्थ-
कसतूरी ~ कस्तूरी जैसी सुगंध
महमहीं ~ महकने लगी
बास ~ सुगंध
व्याख्या : तब मुख से कस्तूरी के समान सुगंध आने लगी और मुँह से निकलने वाली हर वाणी में ईश्वरीय प्रेम की सुगन्ध फूट पड़ी।
नैनां अंतरि आव तूँ, ज्यूँ हौं नैन झंपेउँ।
शब्दार्थ-
अंतरि ~ अंदर
झंपेउँ ~ बंद कर लूँ
व्याख्या : हे प्रभु जैसे ही मैं अपनी आँखें बंद करूँ आप तुरंत मेरी आँखों के भीतर आकर बस जाइए।
ना हौं देखौँ और कूँ, ना तुझ देखन देउँ।। 17 ।।
शब्दार्थ-
हौं ~ मैं
और कूँ ~ किसी अन्य को
व्याख्या : जिससे न तो मैं किसी अन्य को देख सकूँ और न ही आपको किसी और को देखने दूँ।

जीवात्मा का परमात्मा में पूर्ण विलय और मोक्ष :
कबीर हरि रस यों पिया, बाकी रही न थाकि।
शब्दार्थ-
हरि रस ~ ईश्वर की भक्ति का आनंद
थाकि ~ प्यास या थकान
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने ईश्वर की भक्ति का आनंद छककर पी लिया है और अब सांसारिक सुखों की कोई प्यास बाकी नहीं है।
पाका कलस कुँभार का, बहुरि न चढ़हिं चाकि।। 18 ।।
शब्दार्थ-
पाका ~ पका हुआ
कलस ~ घड़ा
चाकि ~ चाक
व्याख्या : जिस प्रकार कुम्हार का घड़ा जब पूरी तरह पक जाता है तो उसे दोबारा चाक पर नहीं चढ़ाया जाता वैसे ही मुझे भी अब जन्म-मरण के चक्र में नहीं आना पड़ेगा।
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ।
शब्दार्थ-
हेरत हेरत ~ खोजते खोजते
हिराइ ~ खो गया
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि हे सखियो उस परमात्मा को खोजते-खोजते मैं स्वयं उसी में खो गया हूँ और मेरा अस्तित्व उसी में लीन हो गया है।
बूँद समानी समंद में, सो कत हेरी जाइ।। 19 ।।
शब्दार्थ-
समानी ~ मिल गई
समंद ~ समुद्र
कत ~ कैसे
व्याख्या : जिस प्रकार पानी की बूँद समुद्र में मिलकर उसी का रूप हो जाती है फिर उसे अलग से कैसे खोजा जा सकता है।
कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
शब्दार्थ-
खाला ~ मौसी
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि यह ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रेम का घर है यह कोई मौसी का घर नहीं है जहाँ कोई भी बिना मेहनत के आसानी से चला जाए।
सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माहिं।। 20 ।।
शब्दार्थ-
सीस उतारै ~ सिर काटना या अहंकार त्यागना
हाथि करि ~ हाथ में लेकर
पैठे ~ प्रवेश करे
व्याख्या : जो अपने अहंकार रूपी सिर को काटकर अपनी हथेली पर रख सकता है केवल वही इस प्रेम के घर में प्रवेश कर सकता है।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
शब्दार्थ-
मैं ~ अहंकार
हरि ~ ईश्वर
व्याख्या : जब तक मेरे भीतर अहंकार था तब तक मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई और अब जब ईश्वर मिल गए हैं तो मेरा अहंकार पूरी तरह नष्ट हो गया है।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं।। 21 ।।
शब्दार्थ-
अँधियारा ~ अज्ञान का अंधकार
देख्या ~ देखा
माहिं ~ अंदर
व्याख्या : जब मैंने अपने हृदय के भीतर ज्ञान रूपी दीपक को जलते हुए देखा तो मेरा सारा अज्ञान रूपी अंधकार हमेशा के लिए मिट गया।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
* रस: संपूर्ण साखियों में शांत रस एवं भक्ति रस की सुंदर और अविरल धारा बहती है।
* छंद: कबीरदास जी ने अपनी दार्शनिक बातों को आम जन तक पहुँचाने के लिए दोहा छंद का प्रयोग किया है।
* अलंकार: अनुप्रास अलंकार के साथ-साथ रूपक अलंकार और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का अत्यंत मनमोहक प्रयोग हुआ है।
* भाषा: सधुक्कड़ी भाषा का सुंदर प्रयोग किया गया है जो अत्यंत सहज सरल और प्रभावपूर्ण है।
कविता का केंद्रीय संदेश:
सच्चे गुरु के ज्ञान और अहंकार के पूर्ण त्याग के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव है। अज्ञान के मिटते ही जीवात्मा को ब्रह्मानंद का अनुभव होता है और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाती है।